कलियासोत की पहाड़ी पर रसूखदारों ने बना लिए बंगले, जिम्मेदारों को भनक नहीं - .

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Thursday, 10 October 2019

कलियासोत की पहाड़ी पर रसूखदारों ने बना लिए बंगले, जिम्मेदारों को भनक नहीं

कलियासोत की पहाड़ी पर रसूखदारों ने बना लिए बंगले, जिम्मेदारों को भनक नहीं

राजधानी से सटे गांव चंदनपुर, मिंडोरा, मिंडोरी और छावनी में 15 साल में करीब 280 एकड़ में रिसॉर्ट से लेकर कोठियां तक तन गईं। लेकिन वन विभाग व जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसका पर्दाफाश केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की सर्वे रिपोर्ट में हुआ है। एनजीटी ने इस मामले में सभी पक्षों को नोटिस जारी किए तो जिला प्रशासन और वन विभाग ने जमीन उनकी होने से इंकार कर दिया।
राजधानी के सतीश नायक और राशिद नूर ने एनजीटी में अलग-अलग याचिका दायर की थी। उन्होंने बताया था कि केरवा व कलियासोत में बाघ मूवमेंट क्षेत्र में 30 लोगों ने रिसॉर्ट से लेकर फॉर्म हाउस तक का निर्माण कर लिया है। किसी से भी अनुमति भी नहीं ली है। इस पर एनजीटी ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करने के साथ ही केन्द्र के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को एरियल सर्वे कर रिपोर्ट मांगी थी। 

रिपोर्ट के अनुसार साल 2003 में 111 एकड़ में इस क्षेत्र में निर्माण हुए थे। जो 2018 में बढ़कर 390 एकड़ हो गया है। यानि 15 साल में 279 एकड़ में और निर्माण हो गया। इसके आधार पर एनजीटी ने नोटिस जारी कर इस क्षेत्र में निर्माण करने वाले सभी लोगों को अगली सुनवाई में उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। एनजीटी को इन लोगों को बताना होगा कि किस विभाग की अनुमति से निर्माण कार्य किए हैं।
एक याचिका पर सर्वे रिपोर्ट दूसरी में बनाया पार्टी :- एनजीटी ने राशिद नूर की याचिका पर सुनवाई करते हुए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से रिपोर्ट मांगी थी। मंत्रालय ने बताया है कि 390 एकड़ जमीन पर रिसॉर्ट से लेकर फॉर्म हाउस तक बन गए हैं। इस पर सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। जबकि सतीश नायक की दूसरी याचिका में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 34 लोगों को नोटिस जारी कर पार्टी बनाने के निर्देश दिए हैं। इस पर सुनवाई 10 अक्टूबर को होगी।
नियमानुसार 200 से ज्यादा पेड़ हैं तो जमीन वन विभाग की :- साल 1997 में गोदा वर्मन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि यदि दस हेक्टेयर के क्षेत्र में दो सौ छोटे-बड़े पेड़ होने पर यह जमीन वन की मानी जाएगी। इस हिसाब से यह जमीन वन विभाग की होनी चाहिए। इसी निर्देश के आधार पर 24 अगस्त को वन विभाग मुख्य वन सरंक्षक ने कलेक्टर भोपाल को पत्र लिखकर इस जमीन का खसरा, रकबा, नक्शा मांगा है।
नियम, कानून पर रसूख भारी :- ऐसा नहीं है कि कोठियों से लेकर फॉर्म हाउस एक दिन में बन गए। लेकिन इसे बनाने वालों में आईएएस, आईपीएस अधिकारियों से लेकर राजनीतिक हस्तियां तक शामिल हैं। इनका रसूख चाहे पुरानी सरकार हो या वर्तमान कभी कम नहीं हुआ। इन पर कार्रवाई होना तो दूर इस बारे में कोई सोच भी नहीं सकता है। यही वजह है कि विभाग अपनी जमीन मानने को ही तैयार नहीं है।
जिम्मेदारों का कहना :-  हमारे पास कोई जानकारी नहीं है एनजीटी को इस संबंध में जवाब दिया है। लेकिन यह जमीन हमारी नहीं है। इस जमीन से संबंधित कोई भी डाटा हमारे पास नहीं है। यदि जिला प्रशासन हमें यह जमीन सौंपकर निर्माण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कहता है तो हम इसके लिए तैयार हैं।

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