बारिश से बिगड़ी सड़कें : तकनीक नहीं, मानसिकता बदलें - .

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Sunday, 29 September 2019

बारिश से बिगड़ी सड़कें : तकनीक नहीं, मानसिकता बदलें

बारिश से बिगड़ी सड़कें : तकनीक नहीं, मानसिकता बदलें!

मध्यप्रदेश में भारी बारिश के दुष्प्रभाव अब सड़कों पर भी नजर आने लगे हैं। बारिश से लबालब होने के बाद अब उनके गड्ढे रास्तों का रोड़ा बन रहे हैं। आम जनता की परेशानी कई गुना बढ़ गई है। लोक निर्माण विभाग का कहना है कि इस साल भारी बारिश से प्रदेश में 22,522 किमी लंबाई की सड़कें और 845 पुल- पुलिया क्षतिग्रस्त हुए हैं। इस आंकड़े के हिसाब से मध्यप्रदेश की करीब आधी सड़कों पर पानी फिर गया है, अब मरम्मत के नाम पर 1188 करोड़ रुपए का बजट मांगा गया है लेकिन यह कहानी हर बार की है।
बड़ा सवाल यही है कि जब बारिश हर साल होती है, उसका पैटर्न, समयावधि भी सभी को मालूम है तो सड़कें बारिश का पानी झेल क्यों नहीं पातीं? विशेषज्ञों की मानें तो बारिश के बाद गड्ढे भरना बीमारियों को साथ लेकर चलने जैसा है, सड़क की तो तुरंत मरम्मत होना चाहिए। इसके लिए तकनीक से ज्यादा 'माइंड सेट" यानी लापरवाही और चलताऊ काम की मानसिकता बदलने की जरूरत है। हालांकि विभाग का दावा है कि सड़क निर्माण की तकनीक बेहतर है लेकिन डामर (कोलतार) की सड़क पर पानी का भराव ही उसके बरबाद होने का कारण है। इसके अलावा डिजाइन की खामी,ओवरलोड वाहन और समय पर मेंटेनेंस न होना भी सड़कों को के हाल खस्ता कर रहे हैं।
प्रदेश के ज्यादातर जिलों में बारिश का पानी थमने का नाम नहीं ले रहा, इसलिए लोक निर्माण विभाग सड़कों की मरम्मत शुरू नहीं कर पा रहा। इस कारण भी सड़कों के गड्ढे दिन-ब-दिन चौड़े और गहरे होते जा रहे हैं। जाहिर है जन-धन के नुकसान का दायरा भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस बीच सरकार की निर्माण एजेंसी का रवैया अब तक आग लगने पर कुआं खोदने वाला ही रहा है। जबकि सड़क इंजीनियरिंग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि निर्माण तकनीक में भी सुधार की जरूरत है।
सड़क निर्माण के दौरान जरूरी प्रोटोकॉल का पालन होना भी उतना ही जरूरी है। दिल्ली में सड़कों की सेहत अमूमन ठीक मानी जाती है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि न्यूयॉर्क, बीजिंग, जकार्ता और सिंगापुर जैसे शहरों- देशों में प्रयुक्त सड़क निर्माण की सामग्री की गुणवत्ता और भारत की सामग्री लगभग एक जैसी है। उनमें बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। सबसे अहम बात डिजाइन और निर्माण के दौरान जरूरी पैरामीटर का पालन किया जाना है। इस विषय पर प्रस्तुत है दो विशेषज्ञों से खास बातचीत...
लापरवाही, बस... एक ही उदाहरण काफी है :- सीपीडब्ल्यूडी के पूर्व मुखिया भीष्म कुमार चुघ ने सड़कों की गुणवत्ता के संदर्भ में एक रोचक किस्सा भी सुनाया। वे बताते हैं कि एक बार सड़क निर्माण स्थल पर मैंने बिना परिचय दिए संबंधित ठेकेदार से पूछा कि तुम्हारे पास थर्मामीटर है कि नहीं? इस पर उसका जवाब था कि 'मैं क्या डॉक्टर हूं जो थर्मामीटर रखूंगा।' चुघ बताते हैं कि सड़क निर्माण के दौरान डामर का तापमान 160 डिग्री से. और जमीन का 180 डिग्री से. होना जरूरी है। अमूमन इसका ध्यान नहीं रखा जाता और सड़क में मजबूती नहीं आती। अब बिना इस पैरामीटर का पालन किए सड़क कैसी बनी होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है।

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