मोक्ष काष्ठ से शवदाह करने का प्रयोग, सालभर में कटने से बच सकेंगे हजारों पेड़ - .

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Thursday, 19 September 2019

मोक्ष काष्ठ से शवदाह करने का प्रयोग, सालभर में कटने से बच सकेंगे हजारों पेड़

मोक्ष काष्ठ से शवदाह करने का प्रयोग, सालभर में कटने से बच सकेंगे हजारों पेड़

पर्यावरण और जंगल बचाने की दिशा में नागपुर की तर्ज पर इंदौर में भी एक प्रयोग किया गया। इसमें बायोमास ब्रिकेट्स (मोक्ष काष्ठ) से पंचकुइया मुक्तिधाम में दो शवों का दाह संस्कार किया गया। ईको फ्रेंडली लिविंग फाउंडेशन की पहल पर नागपुर नगर निगम ने एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसमें अंतिम संस्कार के लिए बायोमास ब्रिकेट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है और तीन साल में चार हजार शवदाह किए गए। अब यह धीरे-धीरे लोगों के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। इंदौर की सामाजिक संस्था नेचरल वेस्ट यूटिलिटी के माध्यम से इसका पंचकुइया मुक्तिधाम में प्रदर्शन किया गया।
एग्रो वेस्ट से बनता है बायोमास ब्रिकेट्स :-  पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर और ईको फ्रेंडली लिविंग फाउंडेशन के अध्यक्ष विजय लिमये ने चार साल पहले लकड़ी के विकल्प के रूप में बायोमास ब्रिकेट्स तैयार किया। फसल कटने के बाद खेतों से निकलने वाले एग्रो वेस्ट (नरवई) से इसे तैयार किया जाता है। किसान के लिए यह एग्रो वेस्ट वर्तमान में बडी परेशानी है। आमतौर पर किसान इसे खेतों में ही जला देते हैं। इसकी वजह से न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, बल्कि प्रदूषण का स्तर भी बढ़ जाता है। दिल्ली, उप्र सहित कई राज्यों के लिए यह एक बड़ी समस्या है।
मशीन की लागत 20-30 लाख रुपए :-  ब्रिकेट बनाने के लिए कॉम्प्रेशर मशीन की जरूरत होती है। इसे मॉडिफाइ कर तैयार की गई है। इसकी लागत 20-30 लाख रुपए है। मशीन से एक दिन में आठ से दस टन ब्रिकेट निकाले जा सकते हैं। मशीन और शेड लगाने के लिए आठ से 10 हजार वर्गफीट जमीन की जरूरत होती है।
किसानों के लिए फायदेमंद :-  लिमये के मुताबिक अभी नरवई को नष्ट करना किसानों के लिए मुसीबत है। अब वे बायोमास ब्रिकेट्स बनाने के लिए नरवई बेचकर अपने बीज का खर्च निकाल सकते हैं।
एक शव के लिए 250 किलो ब्रिकेट की जरूरत  :- एक शव के लिए 250 किलो ब्रिकेट की जरूरत होती है। लिमये के मुताबिक ब्रिकेट बेलनाकार होता है। एक ब्रिकेट एक किलो का होता है और इसे बनाने की लागत लगभग साढ़े चार रुपए आती है। जबकि बाजार में साढ़े सात रुपए तक मिल जाता है। यानी एक शव के लिए लगभग 1800- 2000 रुपए खर्च आता है, जो लकड़ी के बराबर ही है। इसे इलेक्ट्रिक शवदाह गृह से भी बेहतर विकल्प माना जा रहा है। इलेक्ट्रिक मशीन को भट्टी की तरह रोजाना एक तय तापमान पर जलाकर रखना पड़ता है जिसमें बिजली की खपत बहुत ज्यादा होती है।
बचा सकते हैं 100 वर्ग किमी का जंगल :-  शोध के मुताबिक देश में रोज 45000 शवों का अंतिम संस्कार होता है। इस हिसाब से साल में लगभग 80 लाख शवदाह होते हैं। इसके लिए 1.70 करोड़ पेड़ लगते हैं। इसमें 15 से 18 साल की उम्र के पेड़ लगते हैं, जो लगभग 100 वर्ग किमी जंगल के बराबर के होते हैं। हर साल सिर्फ अंत्येष्टि के लिए इतने पेड़ काट दिए जाते हैं। शव को जलाने के लिए ऐसी लकड़ी की जरूरत है, जो लगातार तीन घंटे तक जल सके। इसलिए शवदाह में पीपल, बरगद, आम, इमली आदि लंबी उम्र वाले पेड़ों की लकड़ियों का ही ज्यादा इस्तेमाल होता है।
इंदौर नगर निगम को लिखा है पत्र :-  नेचरल वेस्ट यूटिलिटी के रोहित शर्मा कहते हैं कि मोक्ष कास्ट का दो महीने पहले इंदौर में प्रयोग किया गया है। नगर निगम कमिश्नर को भी पत्र लिखा है। उन्होंने मुक्तिधाम समितियों से चर्चा करने को कहा था। हम सभी समितियों से भी चर्चा कर रहे हैं। अच्छी पहल हो सकती है।

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