'सरकार आयरन जिंक की गोलियां देने के बजाए 250 ग्राम गेहूं की रोटी खिलाएं' - .

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Tuesday, 27 August 2019

'सरकार आयरन जिंक की गोलियां देने के बजाए 250 ग्राम गेहूं की रोटी खिलाएं'

'सरकार आयरन जिंक की गोलियां देने के बजाए 250 ग्राम गेहूं की रोटी खिलाएं'

रवींद्र नाट्यगृह में आयोजित गेहूं और जौ के 58वें राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन सोमवार को हुआ। आखिरी दिन देशभर से आए प्रगतिशील किसानों ने अपनी सफलता की कहानी बताने के साथ कुछ सुझाव भी रखे। मथुरा (उप्र) से आए किसान सुधीर अग्रवाल ने कहा कि गेहूं की हर प्रजाति में आयरन, जिंक व प्रोटीन की मात्रा होती है। एक अध्ययन के मुताबिक आम आदमी प्रतिदिन करीब 250 ग्राम गेहूं का सेवन करता है। यदि सरकार आयरन व जिंक की प्रचुर मात्रा वाले गेहूं का सेवन हर व्यक्ति को करवाए तो आयरन व जिंक की गोलियां नहीं खानी पड़ेगी। सरकार को ऐसी प्रजातियों के उत्पादन पर ध्यान देना चाहिए। गेहूं की डब्ल्यूबी-2 प्रजाति में जिंक ज्यादा है और यह काफी फायदेमंद है। जिन प्रजातियों में जिंक की मात्रा कम होती है, यदि गेहूं के पौधों पर फूल आने के दौरान ही जिंक का स्प्रे कर दिया जाए तो उनमें भी यह मात्रा बढ़ जाती है। गेहूं की बीएच-25 प्रजाति में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है। 

सुझाव : बिस्किट की तरह गेहूं की बोरियों पर भी हो तत्वों की मात्रा :- बिस्किट की तरह गेहूं के पैकेट व बोरियों पर भी जिंक, प्रोटीन व आयरन की मात्रा लिखी जानी चाहिए। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च ने नीति आयोग को इस संबंध में पत्र लिखा है। क्वालिटी वाले गेहूं का प्रमाणीकरण हो और उसके मूल्य का निर्धारण सामान्य गेहूं से अलग किया जाए। 

दुबई में चला रहे थे ट्राला, अब किसानों के लिए बीज तैयार कर कमा रहे फायदा :-  पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले के रहने वाले किसान बहादुरसिंह झरिया ने कहा कि वे बहुत पहले दुबई गए थे, वहां उनके दो ट्राले चलते थे। एक वो खुद चलाते थे। पिताजी ने उन्हें गांव वापस बुलाया और खेती-किसानी करने की सलाह दी। गांव आकर उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से खेती करना सीखी। उन्हें पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से नई वैरायटी डीबीडब्ल्यू 221 का एक किलो गेहूं दिया गया। उन्होंने उसे एक हेक्टेयर में बेड पद्घति से लगाया और उससे उन्होंने 22 क्विंटल गेहूं के बीज तैयार किए। वर्तमान में गेहूं, धान, मूंग के बीज तैयार कर रहे हैं। 

सुझाव : किसानों को आसानी से उन्नात बीज मिले :- झरिया ने अपने गांव में एक रिटेल काउंटर भी खोला है, जहां से वे किसानों को गेहूं के बीज उपलब्ध करवा रहे हैं। ऐसे सेंटर अन्य गांव-शहरों में खुलना चाहिए। 

सरकारी नौकरी छोड़ खेती को अपनाया :- मप्र के मुरैना जिले के रहने वाले किसान जयदीपसिंह तोमर ने कहा कि मुझे बचपन से ही खेती के प्रति लगाव था। स्नातक के बाद कृषि विश्वविद्यालय ग्वालियर से प्रशिक्षण लिया और कृषि की आधुनिक तकनीक, बीज चयन को जाना। उनकी नौकरी महिला बाल विकास विभाग में जिला समन्वयक के रूप में लग गई थी। वहां पांच दिन काम करना होता था, इस वजह से वे सप्ताह के दो दिन खेती के कार्य को देते थे। जब उन्हें खेती में अच्छा उत्पादन और उपज की अच्छी कीमत मिलने लगी, तो उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। अब वे पूरी तरह खेती कर रहे हैं। 

सुझाव : डेढ़ गुना तो हो गया लाभ :- कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में गेहूं व धान की जो नई प्रजाति लगाई है उससे उन्हें डेढ़ गुना अतिरिक्त लाभ हुआ है।
नौ हजार रुपए में बोवनी से लेकर उत्पाद तक के सारे काम हो जाते हैं :- छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रहने वाले किसान राघवेंद्र सिंह ने बताया कि हमारा राज्य धान उत्पादक राज्य है। वहां धान की रोपाई में ही आठ से नौ हजार रुपए खर्च हो जाते हैं लेकिन हमने जो तरीका अपनाया है उससे खेती की बोवनी से उत्पाद व दवा खर्च सहित सभी काम नौ हजार रुपए में हो जाते हैं। गोबर में अच्छे व बुरे दोनों तरह के बैक्टीरिया होते हैं। गोबर की खाद को उपचारित कर उसे एक विशेष तापमान पर गर्म करने से उसके अंदर के सारे बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं और उसमें अलग से अच्छी क्वालिटी वाले बैक्टीरिया डालें। इस तरह फसल का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
सुझाव : एक प्लेटफॉर्म पर हो जानकारी :- किसानों की आमदनी को दोगुना करने की बातें और गेहूं, धान, हॉर्टिकल्चर व फूड प्रोसेसिंग के अलग-अलग तरीके बताए जा रहे हैं। इसे एक प्लेटफॉर्म पर लाना चाहिए।
सभी किस्म के बीज मिले, ठेकेदारों की लूट-खसोट हो बंद :- मप्र के नरसिंहपुर के किसान गुलाबसिंह लोधी ने बताया कि मैं गेहूं की अच्छी प्रजातियों का इस्तेमाल कर अब अच्छा उत्पादन कर रहा हूं। गन्ने की फसल खत्म होने के बाद खेत में गेहूं लगाता हूं। बारिश में कुछ खेतों को खाली छोड़ उसमें पानी भरा रहने देता हुआ। दीपावली पर उसमें मसूर और सरसों की बोवनी करता हूं। मार्च में मसूर कटने के बाद बाद उसमें 60 दिन की मूंग की फसल लेता हूं। मसूर की बोवनी में थोड़ी-थोड़ी दूरी में सरसों के पौधे भी लगाता हूं। ये इल्ली का नियंत्रण करती है। जनवरी में जब ठंडी हवा चलती है तो सरसों उसे रोकती है और मसूर की फसल को पाला नहीं लगता। सरकार को किसानों को सभी किस्म के नए बीज उपलब्ध करवाना चाहिए। अभी ठेकेदारों से बीज लेना पड़ता है और उनकी लूट-खसोट रहती है।
सुझाव : बिचौलियों को खत्म कर सीधे किसानों को मिले उन्नत बीज :- सरकार उन्नत किस्म के बीज खुद किसानों को उपलब्ध करवाए। कई किसानों तक तो उसकी जानकारी भी नहीं पहुंच पाती है और बिचौलिए ज्यादा कीमत में बीज बेचते हैं। ऐसे में कई किसान चाहकर भी उन्नत किस्म के बीज नहीं ले पाते हैं।
पहली बार मंच पर बोला, मेरे काम को सराहाने के लिए धन्यवाद :- हरियाणा के किसान सुनील कालरा ने कहा कि कृषि क्षेत्र में मैंने जो कार्य किए, उसके कारण आज मुझे कृषि संबंधित कार्यक्रम में मंच पर बुलाया गया। यह पहला मौका है जब मैं मंच पर बोल रहा हूं। वे किसानों के लिए नए बीज तैयार कर रहे हैं। उन्हें बताते हैं कि जो पुरानी किस्म वो लगा रहे उससे नई किस्म क्यों फायदेमंद है। वर्ष 1997 में सामान्य खेती शुरू की, उसके बाद से मैंने बीजों का उत्पादन चालू किया। इससे हमारा फायदा दो गुना हुआ है।

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