जापानी समोसा हो या 25 मसालों वाली चाय, पुरानी दिल्ली के इन स्ट्रीट फूड का जवाब नहीं - .

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Wednesday, 1 May 2019

जापानी समोसा हो या 25 मसालों वाली चाय, पुरानी दिल्ली के इन स्ट्रीट फूड का जवाब नहीं

जापानी समोसा हो या 25 मसालों वाली चाय, पुरानी दिल्ली के इन स्ट्रीट फूड का जवाब नहीं

पुरानी दिल्ली की शान आज भी वैसे ही बरकरार है जैसे कि मुगलों के समय में हुआ करती थी जब शहजहां की बेटी जहांनारा ने चांदनी चौक की गलियों को बाजार का रूप दिया था और लोग टाउन हॉल के सामने बने चौक पर जिसे मून लाइट स्क्वायर भी कहा जाता है, चांद की रोशनी को देखने जमा हुआ करते थे। अपनी संकरी गलियों, कूचों और हर तरह के सामान के लिए लोकप्रिय पुरानी दिल्ली अपने खाने के लिए भारतीय ही नहीं, विदेशियों को भी लुभाती है। तभी तो इतनी भीड़भाड़ और शोर-गुल के बावजूद खाने की छोटी-छोटी बेतरतीब दुकानों पर हमेशा भीड़ लगी रहती है।
जापानी समोसे की दुकान :- स्ट्रीट फूड यात्रा के बारे में जब मैंने सुना तो मैंने उसकी ऑनलाइन बुकिंग कराई। एक गाइड मुझे कुछ चुनिंदा जगहों पर ले जाने वाली थी। ऐसी जगहें जिनके बारे में अक्सर चर्चा नहीं होती। हमारा मीटिंग प्वाइंट था दिगंबर जैन लाल मंदिर। सबसे पहले हम पहुंचे मोती सिनेमा के सामने लाजपत राय मार्केट में बने मनोहर ढाबे में। चूंकि आजकल चांदनी चौक के सौंदर्यकरण का काम चल रहा है, इसलिए रास्ते थोड़े अजीबो-गरीब ढंग से पार करने पड़ते हैं। सड़क किनारे बनी यह दुकान देखकर नहीं लगेगा कि यहां कुछ खास मिल सकता है। 80 साल पुरानी इस दुकान अपने जापानी समोसे के लिए प्रसिद्ध है। यह समोसा बाकी सारे समोसों से एकदम अलग था, स्वाद से भी और दिखने में भी। इसमें 60 लेयर्स थीं, एकदम वैफर्स जैसा था, इसीलिए एक क्रिस्पी टेस्ट आ रहा था। बीच के हिस्से में मसालों के मिश्रण वाला आलू था। इस समोसे के साथ पिंडी छोले व लौकी का आचार दिया गया, जिससे इससे जायका दोगुना हो गया था। एक समोसा ही इतना बड़ा था कि आप दूसरा नहीं खा सकते। एक प्लेट में दो समोसे होते हैं जिनकी कीमत है 40 रुपये। नाम जापानी समोसा क्यों पड़ा, यह बात किसी को नहीं पता, बस पीढि़यों से इसे बनाया जा रहा है। शायद जापानी पंखे की लेयर्स से प्रभावत हो उसकी परतें समोसे में उतारने की कोशिश का नतीजा हो सकता है।
25 मसालों वाली चाय :- वहां से निकल कर चांदनी चौक की ओर बढ़ने लगे। कोई एक किलोमीटर से कम दूरी पर हमारा अगला पड़ाव था कैलाशचंद जैन चाय वाले की दुकान। गाइड से मैंने पूछा कि चाय क्यों तो उसने बताया कि यहां आप गोल्डन चाय टेस्ट कर सकती हैं। कुल्हड़ में जो चाय मैंने पी उसका स्वाद वाकई लाजवाब था। 25 मसाले, जिनका नाम बताने से वहां के मालिक ने इंकार कर दिया, के अलावा उसमें केसर के लच्छे व कतरे बादाम भी डले थे। यह दुकान भी करीब 80 साल पुरानी है। चौथी पीढ़ी इस समय दुकान को चली रही है। खूब सारे दूध वाली 30 रुपये की यह चाय पीकर मन तृप्त हो गया। 
मिठाई से 100 साल पूरानी दुकान :- सड़क पार कर नई सड़क की ओर बढे़। किताबों और कपड़ों की दुकानों और यहां-वहां लटकते कैबल्स और शोर मचाते दुकानदारों के बीच से राह बनाते चावड़ी बाजार की कोने में बनी दुकान श्याम स्वीट्स पर पहुंचे। जामा मस्जिद से नई सड़क की ओर जाने पर जो तिराहा चावड़ी बाजार और नई सड़क की ओर जाता है, वहीं बाईं ओर देहाती पुस्तक भंडार के पास श्याम स्वीट्स की दुकान है। करीब सौ साल पुरानी इस दुकान पर मिठाइयां, बेड़मी, सब्जी, कचौड़ी और समोसे बेचे जाते हैं। लेकिन असली जलवा मटर की भरवां कचौड़ी का है। 1910 से चल रही यह दुकान मिठाइयों के लिए तो प्रसिद्ध है ही साथ ही इसकी मटर व दाल की कचौड़ी खाने विदेशी भी यहां आते हैं। 40 रुपये कीमत वाली मटर की कचौड़ी इतनी करारी थी कि मिर्च लगने के बावजूद मैं खाती रही। साथ में थी आलू की सब्जी और मेथीदाने की चटनी। 
यहां आएं तो अपना वाहन न लाएं। पैदल या रिक्शे से जाना ही बेहतर है। यह दुकान सातों दिन खुली रहती है। सुबह अगर इस दुकान पर पहुंच जाएं तो नाश्ते के रूप में बेड़मी, आलू की सब्जी, कचालू की चटनी और सीताफल की सब्जी का मजा लिया जा सकता है। मिर्ची लग रही थी इसलिए मेरी गाइड मुझे इसके बाद उस रास्ते पर ले गई जहां चावड़ी बाजार की कार्ड्स की दुकानें। शादी के कार्ड से लेकर हर तरह के कार्ड की दुकानों का अपना जलवा है। काफी अंदर जाकर जहां रुके तो पल भर को लगा नहीं कि इस कम रोशनी वाली जगह पर भी कोई दुकान हो सकती है।
साधारण सी दुकान है जैन कॉफी हाउस :- जहां मेज पर ब्रेड के स्लाइस बिछे थे और उन पर करीने से कटे टमाटर, खीरा आदि के स्लाइस सजे थे। बैठने के लिए यहां-वहां रखीं कुर्सियां और कुछ मेज। अपने फ्रूट सैंडविच के लिए लोकप्रिय यह दुकान 1948 से यहां चल रही है। भूलभुलैया की तरह गलियों को पार कर यहां पहुंचना पड़ता है। दुकान का पलस्तर उखड़ा हुआ था, रोशनी भी कम थी..पर गति से सैंडविच बन रहे थे। पुरानी दिल्ली की यादों को समेटे इस दुकान पर बैठना एक अलग ही अनुभव था। आधुनिकीरण को मुंह चिढ़ाती इस दुकान तक हर कोई नहीं पहुंच सकता, पर फिर भी यहां भीड़ लगी रहती है। स्ट्राबेरी, चीकू, केला, आम, अंगूर, सेब, साथ में पनीर की स्लाइस..हर तरह के सैंडविच मिलते हैं यहां। चाहें, तो मिक्सड फ्रूट सैंडविच ले सकते हैं। वही खाया मैंने। कीमत है 100 रुपये। चार स्लाइस का सैंडविच खाना मुमकिन नहीं था, सलिए थोड़ा सा टेस्ट कर बाकी मैंने पैक करवा लिया। 
चाट का मजा :- चांदनी चौक आएं और चाट न खाएं, ऐसा असंभव है। पर चाट का मतलब केवल गोलगप्पे या दही-भल्ले खाना ही नहीं होता, मेरी गाइड ने कहा और वह मुझे ले गई हीरा चाट कॉर्नर पर जो जाना जाता है अपनी कुल्ले या कुलिया की चाट के लिए। यह दुकान चावड़ी बाजार की लोहे वाली गली में है। चाट की कीमत 50 रुपये से 100 रुपये तक है। संतरा, सेब, खीरा, टमाटर जैसे फ्रूट या सलाद का बीच में से गुदा निकालकर इसमें कुछ और मसालेदार चटपटी, तीखी, मीठी चीज़ों को मिलाकर इसमें भरा जाता है फिर जिस तरह से आप गोलगप्पा एक ही बार में मुंह में डालकर खाती हैं और उसका स्वाद लेती हैं उसी तरह से कुलिया की चाट का मज़ा लिया जाता है। अलग-अलग फलों व सब्जियों को स्कूप कर उसमें उबला चना, अनार, मसाले और नींबू निचोड़ कर यह चाट बनती है। खीरा, टमाटर, आलू, संतरा, आम, तरबूज, पाइनएप्पल—इसका स्वाद निराला है। लाजवाब खीर फल व सब्जियां और तीखे मसाले का स्वाद, मन कर रहा था अब कुछ मीठा होना चाहिए। चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन, थाना हौज काजी पार करते हुए जिस दुकान में पहुंचे, उसका माहौल भी ठेठ पुरानी दिल्ली वाला था। 
सफी मियां की 129 साल पुरानी खीर की दुकान :- जो उनके दादा जी ने 1880 में शुरू की थी। आज उनके पोते इस दुकान को चला रहे हैं, लेकिन दुकान में बदलाव या नया रंग-रूप देने का ख्याल उन्हें कभी नहीं आया। यहां खीर अभी भी पुरानी विधि से ही बनाई जाती है, जिसमें काफी मेहनत लगती है। इसे बनाने में छह घंटे से ज्यादा लगते हैं। चूल्हे पर लकड़ी की धीमी आंच पर खीर पकाई जाती है। इससे उसका रंग हल्का गुलाबी दिखता है और खीर पर मोटी मलाई की परत भी चढ़ जाती है। परात भरकर खीर दुकान में आती है और फिर स्टील की कटोरी में 100 ग्राम के वजन के हिसाब से डालकर उसे आइस बॉक्स में ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है। 30 रुपये में इस खीर का लुत्फ उठाया जा सकता है। मेरा पेट तो भर गया था, पर पुरानी दिल्ली के जायके कहां खत्म होने वाले थे। अगली बार एक और यात्रा पर वापस आने के लिए मैं लौट आई।

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