जीआई टैग मिलने के नौ साल बाद भी साड़ियों की नकल पर नहीं लगी रोक - .

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Friday, 5 April 2019

जीआई टैग मिलने के नौ साल बाद भी साड़ियों की नकल पर नहीं लगी रोक

जीआई टैग मिलने के नौ साल बाद भी साड़ियों की नकल पर नहीं लगी रोक

महेश्वर के बुनकरों और कारोबारियों ने विश्व व्यापार संगठन से महेश्वरी साड़ी के लिए जीआई टैग (जियोग्राफिकल इंडिकेशन, भौगोलिक संकेतक) हासिल कर लिया, फिर भी महेश्वरी साड़ी की रक्षा नहीं हो पा रही है। महेश्वरी साड़ी की गुणवत्ता, रंग-रूप ही उसके लिए मुसीबत बन गया है। सैकड़ों वर्ष पहले महेश्वर के बुनकरों के हाथों के हुनर से निकली महेश्वरी साड़ी का कुछ लालची कारोबारी चीर-हरण करने पर तुले हैं।
ऐसे में इन साड़ी की गरिमा को बचाने के लिए फिर किसी कृष्ण की जरूरत है। महेश्वर के हर तीसरे-चौथे घर में महेश्वरी साड़ी बन रही है। शहर में छह हजार से अधिक बुनकर इस काम में लगे हैं। हर साल यहां करीब 30 हजार साड़ियां बुनी जाती हैं। उम्दा किस्म के सिल्क और कॉटन से बनी ये साड़ियां जैसे-जैसे मशहूर होती चली गईं, वैसे-वैसे बाजार में मिलावटी और नकलची कारोबारी इसके पीछे पड़ गए। इंदौर, उज्जैन, बड़नगर, सीहोर, सौंसर के अलावा सूरत में भी इस साड़ी की नकल होने लगी है। इससे आम खरीदार के लिए असली और नकली की पहचान मुश्किल होती जा रही है।

चंदेरी से अधिक लाड़, महेश्वरी पर नहीं :- महेश्वरी की तरह ही मप्र के चंदेरी की साड़ी भी बहुत प्रसिद्ध है। चंदेरी पर सरकार का अधिक लाड़-प्यार है जबकि महेश्वरी पर नहीं। चंदेरी को सिंधिया राज परिवार का सहारा रहता है, लेकिन में महेश्वरी के लिए कोई मजबूत राजनीतिक हाथ नहीं है। कुटीर एवं ग्रामोद्योग विभाग के सहायक संचालक राजकुमार सराफ का कहना है जीआई टैग के लिए बुनकरों और कारोबारियों की ही समिति बनाई गई है।

यदि कहीं महेश्वरी साड़ी की नकल हो रही है तो वे शिकायत करें। हम उसके खिलाफ एफआईआर कराएंगे। वुमन वीव की खादी प्रोजेक्ट की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर निवेदिता राय बताती हैं भविष्य के संकट को पहचानते हुए हमारी संस्था ने महेश्वर में हैंडलूम स्कूल शुरू किया है। इस स्कूल में मप्र के अलावा गुजरात, बंगाल, राजस्थान और महाराष्ट्र के बुनकरों के बच्चे और प्रशिक्षु 6-6 महीने की बुनाई की ट्रेनिंग ले रहे हैं।

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