पांच साल में बदल गई राजनीति, अदावत भूले, रास्ते भी अलग - .

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Friday, 5 April 2019

पांच साल में बदल गई राजनीति, अदावत भूले, रास्ते भी अलग

Indore Lok Sabha seat: पांच साल में बदल गई राजनीति, अदावत भूले, रास्ते भी अलग

भाजपा की राजनीति ने शहर में नई करवट ली है। परंपरागत प्रतिद्वंद्वी रहे ताई (सुमित्रा महाजन) और भाई (कैलाश विजयवर्गीय) ने अपने रास्ते अलग-अलग कर लिए हैं। राजनीति की बिसात पर शह और मात के बजाय 'सेफ गेम' खेला जा रहा है। विधानसभा चुनाव में न तो ताई तीन नंबर विधानसभा से भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश की दावेदारी में रुकावट बनीं और न ही विजयवर्गीय ने लोकसभा चुनाव में ताई की खिलाफत की। विजयवर्गीय के सिपहसालार विधायक रमेश मेंदोला लोकसभा चुनाव का मैनेजमेंट संभाल रहे हैं और मंगलवार को दो नंबर विधानसभा में ताई का जोरदार स्वागत भी चर्चाओं में है।
राजनीतिक कद बढ़ने के बाद महापौर मालिनी गौड़ को ताई के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। 'ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर' की रणनीति अपनाने वालीं मालिनी की महत्वाकांक्षा भी बदल गई है। वे भी निगम के गलियारों से निकलकर दिल्ली का सफर करना चाहती हैं। हालांकि लोकसभा टिकट के लिए उनकी तरफ से भी खुलकर दावा नहीं जताया जा रहा, लेकिन इनकार भी नहीं किया जा रहा है। 

दबाव की राजनीति के बजाय मैनेजमेंट पर जोर :- विजयवर्गीय की गिनती पहले दबाव की राजनीति करने वाले नेताओं में होती थी। उनकी अदावत हमेशा उनके कद से बड़े नेताओं से ही रही, जब वे दो नंबर क्षेत्र के विधायक थे तो उन्हें सांसद सुमित्रा महाजन के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता था। 10 साल पहले तक उन्होंने ताई की खुलेआम खिलाफत की। जब वे प्रदेश सरकार में मंत्री बने तो उस दौरान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से भी उनकी पटरी नहीं बैठी। राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद उनकी राजनीति के मायने भी बदल गए। अब उनका जोर मैनेजमेंट पर है। हरियाणा में भाजपा की सरकार बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही। इसके बाद संगठन ने उन्हें पश्चिम बंगाल का जिम्मा दिया। वे इंदौर से चुनाव लड़ने के बजाय पश्चिम बंगाल में ही व्यस्त रहना चाहते हैं, ताकि सीटें बढ़ने की स्थिति में दिल्ली में उनका राजनीतिक कद और बढ़ जाए।
दिल्ली में बढ़ाई सक्रियता :- लगातार आठ बार की सांसद सुमित्रा महाजन के राजनीतिक करियर के लिए बीते पांच साल सर्वश्रेष्ठ रहे। लोकसभा स्पीकर बनने की चुनौती को उन्होंने स्वीकारा और लोकसभा का संचालन भी सफलतापूर्वक किया। इन पांच सालों में उनकी सक्रियता दिल्ली में ही ज्यादा रही और उनका भी राजनीतिक कद बढ़ा। इस दौरान स्थानीय राजनीति में उनकी दखलअंदाजी भी कम ही रही। विधानसभा चुनाव के टिकटों को लेकर संगठन ने उनकी राय को तवज्जो दी, लेकिन उन्होंने दूसरी सीटों पर किसी की दावेदारी पर रोड़े भी नहीं अटकाए। अभी तक की सूची में उनका नाम नहीं है, इसे लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा भी है, लेकिन उनकी उम्मीदवारी तय मानी जा रही है।
खुद की लाइन बढ़ाने पर दिया जोर :-मालिनी गौड़ का राजनीतिक करियर सिर्फ 11 साल का है, लेकिन उनकी धाक भोपाल से लेकर दिल्ली तक जम गई। महापौर रहते हुए इंदौर को लगातार तीन बार स्वच्छता अवार्ड दिलाकर उन्होंने अपनी नई पहचान बनाई। पति लक्ष्मणसिंह गौड़ के निधन के बाद संगठन ने उन्हें चार नंबर विधानसभा का टिकट दिया था। उन्होंने चुनाव जीता, चार नंबर की टीम को बिखरने नहीं दिया। मेयर बनने के बाद नई चुनौतियों को स्वीकारा। अपर आयुक्त चांटा कांड के बाद दो नंबर विधानसभा के खेमे की नाराजगी उन्हें झेलना पड़ी। कई मामलों में उनका विरोध भी हुआ, लेकिन मालिनी ने 'रुको और देखो' की रणनीति ही अपनाई। अपनी तरफ से किसी तरह का मोर्चा खोलने के बजाय उन्होंने अपनी लाइन बढ़ाने पर जोर दिया।

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