विशेष योग संयोग से युक्त होगी सोमवती अमावस्या, 71 साल बाद बन रहा है यह दुर्लभ योग - .

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Saturday, 2 February 2019

विशेष योग संयोग से युक्त होगी सोमवती अमावस्या, 71 साल बाद बन रहा है यह दुर्लभ योग

विशेष योग संयोग से युक्त होगी सोमवती अमावस्या, 71 साल बाद बन रहा है यह दुर्लभ योग

माघ मास के कृष्ण पक्ष की मौनी अमावस्या इस बार 4 फरवरी सोमवार को सर्वार्थसिद्धि व महोदय योग के संयोग में मनाई जाएगी। इन दो विशिष्ट योगों के साथ इस दिन अर्दोदय योग का महायोग भी बन रहा है। इन दिव्य योगों की साक्षी ने इसकी शुभता को ओर बढ़ा दिया है। ऐसे योगों में तीर्थो में स्नान तथा दान-पुण्य से आम अमावस्या से कई गुना अधिक शुभफल प्राप्त होता है। इस दिन क्षेत्रीय मंदिरों में व कपिलेश्वर धाम में विशेष भीड़ रहेगी।
71 साल बाद यह दुर्लभ योग :- पं पवन पारीक ने बताया की यह दुर्लभ योग 71 साल बाद कुंभ के दौरान बन रहा है। इससे पहले 8 फरवरी 2016 को यह महासंयोग हुआ था व भविष्य में लगभग 17 साल बाद 2036 को यह सौभाग्यशाली संयोग बनेगा। हालांकि 2022 में भी माघ मास की अमावस्या तिथि सोमवार के दिन आरंभ हो रही है, लेकिन दोपहर बाद शुरू होने के कारण अमावस्या तिथि अगले दिन यानि मंगलवार को मानी जाएगी। इस लिहाज से मौनी अमावस्या व सोमवती अमावस्या का यह संयोग बहुत ही सौभाग्यशाली है।

पं पारीक ने बताया कि सोमवती मौनी अमावस्या पर श्रवण नक्षत्र की साक्षी से सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। इसके साथ व्यतिपात योग के होने से यह महोदय नामक योग बना रहा है। धर्मशास्त्रीय मान्यता में 1 करोड़ सूर्य ग्रहण के बाद स्नान और दान करने से जो पुण्य फल प्राप्त होता है। वह इस दिन मिलेगा। पंडित पारीक ने कहा कि वैदिक ज्योतिष की ग्रह गोचर गणना के अनुसार सोमवती मौनी अमावस्या पर सूर्य, चंद्र, बुध, केतु मकर राशि में गोचर करेंगे। इस तरह चर्तुग्रही युति का यह संयोग बहुत कम बनता है और यह शुभ माना जाता है इसलिए भी इस दिन का महत्व बढ़ गया है। यह योग सूर्य चंद्र की मकर राशि में मौजूद स्थिति पर केंद्रित है, श्रवण नक्षत्र भी है जिसका स्वामी चन्द्रमा है।
हिंदू धर्म में विशेष महत्व :- सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। यह वर्ष में लगभग एक अथवा दो ही बार पड़ती है। इस अमावस्या का हिंदू धर्म में विशेष महत्त्व है। इस दिन मौन व्रत रहने से सहस्र गौ दान करने का फल मिलता है। इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चंदन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान है। कुछ अन्य परंपराओं में भंवरी देने का भी विधान है। धान, पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधान पूर्वक तुलसी के पेड़ को चढ़ाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्त्व है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ और सभी दुखों से मुक्त होगा। रूद्राभिषेक करने से राहु-केतु शांत होते हैं। कालसर्प दोष निवारण के लिए यह अनूठा संयोग है। माघ मास में नदी, तालाबों व जलाशयों में स्नान, मन-मस्तिष्क को शांत प्रदान करने वालों होता है। सोमवती अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण और कर्मकांड के साथ ही स्नान और यज्ञ का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि पितरों को जल देने से उन्हें तृप्ति मिलती है।

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