शिक्षा विभाग में प्रमुख पदों पर महिलाएं, फिर भी स्कूल जाने में छात्राएं पीछे - .

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Tuesday, 22 January 2019

शिक्षा विभाग में प्रमुख पदों पर महिलाएं, फिर भी स्कूल जाने में छात्राएं पीछे

शिक्षा विभाग में प्रमुख पदों पर महिलाएं, फिर भी स्कूल जाने में छात्राएं पीछे

प्रदेश में सरकारी स्कूलों में साल-दर-साल बच्चों की संख्या कम हो रही है। हर साल प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में 3 से 4 लाख बच्चों की संख्या घट रही हैं। प्रदेश में चल रहे 'स्कूल चले हम' अभियान, 'बेटी पढ़ाओ' सहित अनेक योजनाओं में सालाना करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद सरकारी स्कूलों में बच्चों की दर्ज संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो रही। हालात यह है कि पिछले दो सालों में छह लाख बच्चों ने सरकारी स्कूल छोड़ दिया है। शाला त्यागी (ड्राप आउट) बच्चों में छात्राओं की संख्या छात्रों के मुकाबले ज्यादा है। स्कूल शिक्षा विभाग ने यह रिपोर्ट जारी की है।
वहीं, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत गैर सरकारी संगठन प्रथम के वार्षिक सर्वेक्षण एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) में भी यह बात सामने आई है कि आठवीं में शाला त्यागी छात्राओं का प्रतिशत 26.8 है, जबकि छात्रों की संख्या 20.2 प्रतिशत है। हालांकि छात्राओं के नामांकन का प्रतिशत छात्रों के मुकाबले ज्यादा है, लेकिन स्कूल छोड़ने में भी छात्राएं आगे हैं। यह स्थिति तब है जब स्कूल शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर महिलाएं ही प्रमुख हैं। इनमें स्कूल शिक्षा प्रमुख सचिव रश्मि अरुण शमी, लोक शिक्षण संचालनालय की आयुक्त जयश्री कियावत और राज्य शिक्षा केंद्र की संचालिका आईरिन सिंथिया हैं, फिर भी छात्राओं को स्कूल में आकर्षित करने में ये महिला अधिकारी पीछे हैं।

बच्चों को लुभाने में 500 करोड़ खर्च करता है विभाग :- प्रदेश सरकार की सभी योजनाएं बच्चों को लुभाकर सरकारी स्कूल तक पहुंचाने की हैं। इसमें केंद्र सरकार द्वारा भी 500 करोड़ का बजट स्कूल चले हम अभियान के तहत दिया जाता है। सरकारी स्कूलों में बच्चों की दर्ज संख्या बढ़े, इसके लिए सरकार निःशुल्क किताबें, यूनिफार्म व साइकिल वितरण जैसी योजनाएं चला रही है। सिर्फ किताबों के लिए 200 करोड़ रुपए का कागज खरीदा जाता है। इसी तरह प्रत्येक बच्चे के हिसाब से गणवेश के लिए 600 रुपए व लगभग 2500 रुपए साइकिल खरीदने के लिए दिए जाते हैं।

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