डेढ़ साल में पहली बार कच्चा तेल 50 डॉलर से नीचे - .

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Sunday, 30 December 2018

डेढ़ साल में पहली बार कच्चा तेल 50 डॉलर से नीचे

डेढ़ साल में पहली बार कच्चा तेल 50 डॉलर से नीचे

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बुधवार को 50 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई। जून, 2017 के बार पहली बार ऐसा हुआ। बाद में हल्की रिकवरी हुई और कीमतें 51 डॉलर तक पहुंच गईं। दरअसल, वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता की वजह से इन दिनों कच्चे तेल की मांग सुस्त है। इसके अलावा बाजार में जरूरत से ज्यादा सप्लाई भी हो रही है, जिसके कारण कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। इस साल 3 अक्टूबर को बेंमचार्क ब्रेंट कू्रड की कीमत 86.74 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया था।
इसके बाद से गिरावट शुरू गई और अब तक करीब 42 प्रतिशत भाव गिर चुके हैं। 1 जनवरी के बाद से इसमें करीब 20 प्रतिशत गिरावट आई है। जून 2017 में ब्रेंट कू्रड की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में ओवरसप्लाई की स्थिति है, जबकि आर्थिक मंदी जैसे हालात की वजह से मांग सुस्त पड़ गई है। पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक ने उत्पादन घटाने का फैसला किया है, लेकिन यह जनवरी 2019 अंत से ही लागू हो पाएगा।
इसके अलावा ओपेक देशों के बीच इस बात पर पूरी तरह सहमति भी नहीं बन पाई है। दूसरी ओर अमेरिका उत्पादन घटाने के मूड में नहीं है। रूस भी उत्पादन बढ़ा रहा है। इसके अलावा लीबिया में एक नया ऑयल फील्ड खुल गया है। ऐसे में कीमतें फौरन बढ़ने की संभावना नहीं है। अगले 2 महीनों के दौरान कच्चे तेल में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा और कीमतें 52 डॉलर की रेंज में बनी रह सकती हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत :- चूंकि भारत अपनी जरूरत का करीब तीन चौथाई कच्चा तेल आयात करता है, लिहाजा इसकी कीमतों में गिरावट आना यहां की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक है। पेट्रोल और डीजल के दाम तेजी से कम हुए हैं, जिसके कारण आगामी महीनों में महंगाई दर घट सकती है। ऐसे में रुपए को सपोर्ट मिलेगा और रिजर्व बैंक नीतिगत ब्याज दरें घटाने के बारे में सोच सकता है।
घटेगा आयात बिल :- कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने और रुपए की विनिमय दर में गिरावट आने की वजह से 'पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल' का अनुमान था कि वित्त वर्ष 2018-19 में तेल आयात बिल करीब 40 प्रतिशत बढ़कर 12,500 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। अब विश्लेषक मान रहे हैं कि आयात बिल में कमी आएगी।
कम होगा व्यापार घाटा :- रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 तक देश का चालू खाता घाटा जीडीपी का 0.6 प्रतिशत था, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के कारण 2017-18 में यह 1.9 फीसदी हो गया। व्यापार घाटे में बढ़ोत्तरी इसकी मुख्य वजह थी। 2017-18 में व्यापार घाटा बढ़कर 16 हजार करोड़ डॉलर हो गया, जो 2016-17 में 11,240 करोड़ डॉलर था। अब उम्मीद जताई जा रही है कि यह दिक्कत कम हो जाएगी।

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