समलैंगिकता से लेकर विवाहेत्तर संबंधों तक, जस्टिस दीपक मिश्रा के 10 अहम फैसले - .

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Monday, 1 October 2018

समलैंगिकता से लेकर विवाहेत्तर संबंधों तक, जस्टिस दीपक मिश्रा के 10 अहम फैसले

समलैंगिकता से लेकर विवाहेत्तर संबंधों तक, जस्टिस दीपक मिश्रा के 10 अहम फैसले

13 महीने के मुख्य न्यायाधीश के अपने कार्यकाल में जस्टिस दीपक मिश्रा ने कई ऐसे ऐतिहासिक फैसले सुनाए जिसने मौलिक अधिकारों के दायरे को न केवल व्यापक किया, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सर्वोच्चता को भी अक्षुण्ण रखा। 
मध्य रात्रि में सुनवाई: जुलाई 2015 को मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी की सजा रोकने के लिए दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात के बाद सुनवाई की। जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली बेंच ने मामला सुना। पूरी रात बहस होने के बाद जस्टिस मिश्रा ने मेमन की फांसी बरकरार रखी थी और सुबह उसे फांसी दे दी गई थी। मध्यरात्रि में सुनवाई का दूसरा मामला इसी साल जुलाई में मामला तब आया जब कर्नाटक में बहुमत से दूर बीएस येद्दियुरप्पा को राज्यपाल ने सरकार बनाने का न्यौता दिया। कांग्रेस के नेता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, हालांकि येद्दियुरप्पा के शपथ-ग्रहण पर रोक नहीं लग सकी।
सिनेमा घरों में राष्ट्रीय गान: 2016 में जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली बेंच ने सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रीय गान चलाये जाने का फैसला सुनाया था। हालांकि बाद में बेंच ने कई बार इस फैसले में संशोधन करते हुए इसे वैकल्पिक बनाया।
प्रतिष्ठा का अधिकार: मई, 2017 को राहुल गांधी,अरविंद केजरीवाल और सुब्रमण्यम स्वामी सरीखे नेता द्वारा डाली गई याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को मटियामेट नहीं किया जा सकता है। जस्टिस मिश्रा ने कहा संविधान के अनुच्छेद में प्रतिष्ठा का अधिकार सन्निहित है। यह किसी का भी मूल अधिकार है। बेंच ने 156 साल पुराने मानहानि के कानून को बरकरार रखा।
ऑनलाइन एफआईआर अनिवार्य: मुख्य न्यायधीश की शपथ लेने के 10 दिनों के भीतर ही पुलिसिया कार्यप्रणाली को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने संबंधी फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी राज्य मुकदमा दर्ज होने के 24 घंटों के भीतर उसे ऑनलाइन करें।
समलैंगिकता को दिलाई पहचान: 6 सितंबर, 2018 को आइपीसी की धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
आधार कार्ड की संवैधानिकता: 27 सितंबर, 2018 को आधार कार्ड की संवैधानिकता पर मुहर लगाई। हालांकि पीठ ने सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने और जन अधिकारों में आधार को अनिवार्य नहीं बताया।
पति-पत्नी और वो अब अपराध नहीं: 27 सितंबर, 2018 को आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक करार दिया। फैसले में कहा गया कि कानून लैंगिक समानता के अधिकार के खिलाफ है।
सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश: 28 सितंबर, 2018 को महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करते हुए सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का लाइव प्रसारण: 26 सितंबर, 2018 को अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की अनुमति दी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लाइव प्रसारण के आदेश से कोर्ट की कार्यवाही में पारदर्शिता आएगी और यह लोकहित में होगा।

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