आलीराजपुर का नूरजहां आम और बड़वानी के पपीते की प्रजाति खतरे में - .

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Tuesday, 18 September 2018

आलीराजपुर का नूरजहां आम और बड़वानी के पपीते की प्रजाति खतरे में

आलीराजपुर का नूरजहां आम और बड़वानी के पपीते की प्रजाति खतरे में

मालवा-निमाड़ में फलों की कई प्रजातियां खतरे में आ गई हैं। खासकर आलीराजपुर का नूरजहां आम और बड़वानी का पपीता। बीते दिनों विभाग से जुटाई गई जानकारी में कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं। नूरजहां आम के क्षेत्र में महज छह पेड़ बचे हैं, जबकि बड़वानी के पपीते में किसान केमिकल का इस्तेमाल ज्यादा कर रहे हैं। इस कारण उसका आकार छोटा होने लगा है।

यह बात स्टेट जैव विविधता बोर्ड के मेम्बर सेक्रेटरी श्रीनिवास मूर्ति ने कही। सोमवार को जैव विविधता पर आधारित क्षेत्रीय कार्यशाला का आयोजन देवी अहिल्या विवि के स्कूल ऑफ कम्प्यूटर साइंस सभागृह में किया गया। कार्यशाला का विषय 'जैव विविधता रणनीति और कार्ययोजना' था। जहां लुप्त हो रही फल, मछली और वन्यप्राणियों की प्रजातियों को बचाने और उनके संरक्षण को लेकर चर्चा हुई।यह भी पढ़ें

उद्यानिकी, कृषि विभाग, वन, मत्स्य समेत अन्य विभाग के संभागीय स्तर के अधिकारी शामिल थे। संभागायुक्त राघवेंद्र सिंह ने कहा कि पर्यावरण असंतुलन के चलते जैव विविधता क्षेत्र में प्रत्येक विभाग को मिलकर काम करने की जरूरत है। तभी इनका समूचा विकास हो सकेगा। कार्यक्रम में धार, झाबुआ, आलीराजपुर, बड़वानी, खरगोन और खंडवा से अधिकारी आए थे, जिन्होंने रणनीति बनाने के अलावा कई सुझाव भी दिए। इन्हें जैव विविधता 2018-30 में शामिल किया जाएगा।
रेत के बिना पानी साफ नहीं हो सकता :- बोर्ड के पर्यावरणविद् श्याम कुमार ने बताया कि नदी किनारों से रेत निकालने का काम इन दिनों 10 गुना बढ़ गया है। कई नदियों के आसपास से रेत निकलना बंद हो गई है। माफिया के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें रोकने वालों को वे मार डालते हैं या उन पर गाड़ी चढ़ा देते हैं। उन पर लगाम कसने का काम सिर्फ सरकारी एजेंसी का नहीं है, बल्कि वहां रहने वालों को भी आगे आना होगा, क्योंकि नदियों के लिए रेत बेहद जरूरी है। उसके बिना पानी साफ नहीं हो सकता है।
उन्होंने कहा कि निरंतर बढ़ती आबादी के चलते जंगल खत्म हो रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि वन्यप्राणी शहरों की तरफ आने लगे हैं। पिछले कुछ सालों में ये घटनाएं काफी आम हो चुकी हैं। लोग यह कहते है कि तेंदुआ-बाघ या अन्य जंगली जानवर हमारे घरों में घुस रहे हैं। पर वास्तविकता यह है कि मनुष्य अपने रहने के लिए उनके ठौर-ठिकानों को नष्ट करने में लगा है। वन्यप्राणियों को बचाने के लिए अब नई योजना बनाने की जरूरत है।

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