'सत्या' को हुए 20 साल, रामू ने अब खोले ये राज - .

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Monday, 2 July 2018

'सत्या' को हुए 20 साल, रामू ने अब खोले ये राज

'सत्या' को हुए 20 साल, रामू ने अब खोले ये राज


राम गोपाल वर्मा की कालातीत क्लासिक फ़िल्म 'सत्या' से पहले मुंबई के अंडरवर्ल्ड को इतने विश्वसनीय तरीक़े से किसी ने बड़े पर्दे पर नहीं दिखाया। सत्या, कल्लू मामा, भीखू म्हात्रे जैसे किरदारों के ज़रिए रामू ने मुंबई की वो दुनिया सबके सामने खोलकर रख दी थी, जो इससे पहले फ़िल्मी पर्दे पर दिखाई तो जाती थी, मगर सच्चाई से कोसों दूर।
3 जुलाई को राम गोपाल वर्मा का 'सत्या' 20 साल का हो रहा है। इस मौक़े पर रामू ने बताया है कि एक काल्पनिक किरदार सत्या कैसे मुंबइया अंडरवर्ल्ड की पहचान और प्रतीक बन गया। रामू ने एक लंबा नोट The Truth Behind Satya लिखकर फ़िल्म के एक-एक किरदार को रचने और गढ़ने की कहानी कही है, वो भी बड़े दिलचस्प अंदाज़ में, जिसे पढ़कर आपका भेजा बिल्कुल शोर नहीं करेगा। पढ़िए रामू का नोट...
प्रोड्यूसर के मर्डर से निकला 'सत्या' :- 1993 में हुए सीरियल ब्लास्ट की वजह से मैंने दाऊद इब्राहिम और कुछ दूसरे गैंगस्टर्स के नाम सुन रखे थे। लेकिन मैंने कभी इस पर विचार नहीं किया था कि अंडरवर्ल्ड आख़िर है क्या? फिर एक दिन मैं एक निर्माता के दफ़्तर में बैठा हुआ था और उन्हें एक कॉल आया कि एक नामी व्यक्ति की किसी गैंग ने गोली मारकर हत्या कर दी है। निर्माता मुझे बता रहे थे कि जिस शख़्स को गोली मारी गई है, वो सुबह 7 बजे सोकर उठे थे और मैंने उन्हें सुबह फोन किया था। वो 8.30 बजे अपने किसी दोस्त से मिलने वाले थे।
उन्होंने बताया था कि वो उनसे मिलने आएगा, मगर क़रीब 9 बजे वो मारे गये। लोगों की यह आदत होती है कि जब कोई इस प्रकार हिंसक और अप्रत्याशित रूप से मौत का शिकार होता है तो वे उसके हरेक लम्हे को याद करते हैं कि उसके साथ क्या हुआ होगा। जब निर्माता बात कर रहे थे, क्योंकि यह मेरी आदत है कि मैं हर वक़्त सिनेमा के नज़रिए से सोचता हूं, मैंने सोचा- “अगर वो व्यक्ति सुबह 7 बजे मारा गया है तो उसके क़ातिल कितने बजे सोकर उठे होंगे? क्या उसने अपनी मम्मी को सुबह जल्दी उठाने के लिए बोला होगा, क्योंकि उसे एक ज़रूरी काम से जाना है? उसने हत्या करने के बाद नाश्ता किया होगा या पहले किया होगा?”
ऐसी बातें मेरे ज़हन में आ रही थीं क्योंकि मैं मारे गये व्यक्ति और हत्यारे के बीच लम्हों के बीच सामंजस्य बैठा रहा था। तभी अचानक मेरे ज़हन में आया कि हम इन गैंगस्टर्स के बारे में तब ही सुनते हैं जब वो मारते हैं या ख़ुद मारे जाते हैं। लेकिन इसके बीच वो क्या करते हैं? यह पहला विचार था, जिसकी परिणीति 'सत्या' में हुई।
ओशिवरा से आया उर्मिला का किरदार :- मेरा एक दोस्त ओशिवरा में चौदहवीं मंज़िल पर रहता है। उसने मुझे एक घटना के बारे में बताया। उसकी बिल्डिंग में उससे ऊपर वाली मंज़िलों में एक शख़्स रहता था। मेरा दोस्त अक्सर लिफ्ट में उससे टकरा जाता था और दोनों एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते थे, मसलन हैलो, कैसे हैं आप या हैप्पी दीवाली वगैरह-वगैरह। फिर एक दिन मेरे दोस्त की पत्नी ने बताया कि उस शख़्स को पुलिस गिरफ़्तार करके ले गई। मुंबई का यह एक पहलू है कि आप एक बिल्डिंग में सालों से रहते रहें, लेकिन आपको पड़ोसी कौन है, इसका पता भी नहीं चलता। इसी विचार से सत्या में उर्मिला का ट्रैक आया। उर्मिला का किरदार नहीं जानता था कि 'सत्या' कौन है, लेकिन फिर भी उसके साथ संबंध बना लेती है।
गुस्से और क्षोभ से निकला भीखू म्हात्रे :- एक दिन मैं अजीत दिवानी नाम के एक सज्जन से मिला, जो मंदाकिनी के पूर्व सचिव थे। मंदाकिनी उस वक़्त दाऊद की प्रेमिका थीं और इसी वजह से अजीत कथित तौर पर कुछ गैंगस्टर्स को जानते थे और उनसे मिलते रहते थे। मेरे साथ हुई बातचीत में, उन्होंने अपना एक अनुभव बयान किया था। वो एक गैंगस्टर के घर गये थे, जिसके भाई को पुलिस ने मार दिया था। उसका भाई भी गैंगस्टर ही था। अजीत ने बताया कि गैंगस्टर अपने भाई की डेड बॉडी को इसलिए गाली दे रहा था क्योंकि उसने उसकी बात नहीं सुनी, जिसकी वजह से उसकी मौत हुई।

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