मानव तस्करों के चंगुल से निकले, लेकिन अब परिवार वाले नहीं कर रहे स्वीकार - .

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Friday, 22 June 2018

मानव तस्करों के चंगुल से निकले, लेकिन अब परिवार वाले नहीं कर रहे स्वीकार

मानव तस्करों के चंगुल से निकले, लेकिन अब परिवार वाले नहीं कर रहे स्वीकार

युवा आखों में कई सपने होते हैं, लेकिन आगे बढ़ने और नई ऊंचाइयों को छूने की चाह में या फिर किसी मजबूरीवश अक्सर वे गलत लोगों के संपर्क में आ जाते हैं। उन्हें बहला-फुसला कर उन्हें देह व्यापार में ढकेल दिया जाता है। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए दिन मानव तस्करी (ह्मूमन ट्रैफिकिंग) के मामले सामने आ रहे हैं। खास कर प्रदेश के सुदूर इलाकों से जहां शिक्षा का अभाव है। वहां से लड़कियों की सर्वाधिक तस्करी हो रही है। उन्हें अच्छी नौकरी, मोटी रकम का लालच देकर बड़े शहरों में ले जाया जाता है। जहां उनसे घरेलूू काम, बंधुआ मजदूरी कराई जा रही है। अक्सर उन्हें देह व्यापार में भी धकेल दिया जाता है।
ये बात गुरूवार को होटल शायाजी में चाइल्ड सेक्सुअल एक्सपॉलीटेशन एंड ट्रैफिकिंग पर हुई कार्यशाला में सामने आई। जहां बात बाल तस्करी से शुरू हुई, जो धीरे-धीरे वृहद स्तर पर पहुंच कर मानव तस्करी तक पहुंच गई। कार्यक्रम में बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष प्रभा दुबे, सचिव नंदलाल चौधरी, डीएसपी एच एस तोमर उपस्थित थे।
दिल्ली से लाए छ़ुडाकर, लेकिन परिवार वालों ने नहीं स्वीकारा :- कार्यक्रम में आई बेरोजगार महिला समिति की प्रदेश अध्यक्ष मनोरमा सिंग ने बताया कि हमें पता चला की दिल्ली में एक बच्ची को बंधक बना कर रखा गया है। हम बड़ी मेहनत से उसे वहां से छुड़ाकर लाए, लेकिन उसके परिवार वाले उसे स्वीकार नहीं रहे थे। हमें उसके परिवार वालों को खूब समझाना पड़ा तब जाकर वे माने।
लड़कियां खुद नहीं आना चाहती, अपनी पुराने जीवन में :- एटीसीईसी साउथ एशिया के राष्ट्रीय समन्वयक मानवेंद्र मंडल ने बताया कि मैंने करीब 40 साल मानव और बाल तस्करी पर काम किया। आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि जो बच्चे, लड़कियां बाहर चली जाती हैं, वो अब अपनी पुरानी जिंदगी में लौटना नहीं चाहती। यह समाज के लिए दुखद है। हमें उन्हें बहुत समझाना पड़ता है। यदि वे वापस आ भी गईं तो कुछ दिनों बाद उसी दलदल वाली जिंदगी में वापस लौट जाती हैं।

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