यहां रमजान में हिंदू भी करते है रोजे और रोजेदारोंं का एहतेराम - .

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Monday, 4 June 2018

यहां रमजान में हिंदू भी करते है रोजे और रोजेदारोंं का एहतेराम

यहां रमजान में हिंदू भी करते है रोजे और रोजेदारोंं का एहतेराम

मैंने अपना सबसे पहला रोजा किस उम्र में रखा यह याद नहीं है, बस इतना याद है की जब मैं काफी छोटा था, शायद स्कूल जाना भी शुरू नहीं किया था। उस वक्त घर के सभी लोग सेहरी के समय उठते थे, मुझे भी रोजा रखने का शौक था, मगर छोटा होने की वजह से वे मुझे नहीं उठाते थे। लेकिन एक बार मैं सेहरी के वक्त उठ ही गया और सबके मना करने के बावजूद भी सेहरी की और उसके बाद हम सभी टहलने भी निकले थे, सुबह फज्र की अजान होने तक सभी ने मुझे रोजा नहीं रखने के लिए बहुत समझाया, लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी। 'मुझे याद नहीं की राो रखने में मुझे कोई तकलीफ या परेशानी हुई भी थी या नहीं मगर मैंने उस दिन अपना वो रोजा पूरा किया।
'लेकिन हाँ उस दिन मुझसे कही ज्यादा मेरे वालदैन (माता-पिता) और सभी घर वाले खुश थे। 'अल्लाह का लाख-लाख शुक्र और एहसान है कि मुझे रोजा रखने का शौक जैसा पहले था, वैसे ही आज भी है 'चाहे कोई भी मौसम हो, मैंने मैंने रोजा जरूर रखा, रोजा रखने की वजह से स्कूल के साथी और सभी टीचर्स के दिलों में भी मेरे प्रति एक अलग ही सम्मान देखने को मिलता था।
यहाँ तक की मेरे सहपाठी दोस्त भी मेरे सामने कुछ खाते पीते नहीं थे, और मैं अपने अनुभव से ये बात यकीनी तौर पर कह सकता हूँ कि इस मुल्क में भले ही कोई किसी भी मजहब का क्यों न हो वे रोजे और रोजेदारो का एहतेराम (सम्मान) जरूर करते हैं। यह बातें जनाब शाहिद इकबाल खान साहब ने नईदुनिया से चर्चा करते वक्त कही। फिलहाल वे माहेनूर एजुकेशन एंड वेलफेयर एकेडमी के सदर और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। वे'दीनी और दुनियावी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शहर में निरन्तर कार्य कर रहे हैं। इनके अलावा हाजी राजा नईम, हाजी अनवर व कादिर वारसी ने भी अपने अनुभव नईदुनिया से साझा किए।
बुलंद आवाज में गाते उठाते थे सेहरी के लिए :- उन्होंने आगे कहा कि मेरी पैदाइश भी 15वें रोजे को सेहरी के वक्त ही हुई थी, और मैं आज भी अपना बर्थ-डे 15वें रोजे को ही सेलिब्रेट करता हूँ। 'पहले सेहरी में जगाने के लिए रात दो बजे से जगाने वाले निकल जाया करते थे, उनमे से एक तो बहोत ही तेज आवाज में चरखी, बजाकर बुलन्द आवाज में गाते हुए निकलते थे-अये रोजेदारो जागो सेहरी का वक्त हो गया।
मुझे लगता है कि रमजान के महीने में पहले कही ज्यादा सुकून और मजा था, सभी साथ मिलकर सेहरी और इफ्तारी किया करते थे। 'इबादत में भी लुत्फ़ आता था, उन दिनों छोटापारा मस्जिद में तराबीह की नमाज मौलाना एजाज कामठवी, साहब पढ़ाया करते थे, जिस किसी भी ने उनके पीछे नमाज और तराबीह पढ़ी हो, वो ये जरूर कहते होंगे कि वो पल यकीनन सभी की जिन्दगी के सुनहरे और यादगार पल होंगे, जिसे कोई भी शायद कभी भूल नहीं नहीं सकता है।
परहेजगारी के साथ अनुशासन भी सिखाता रमजान :- माहे रमजान हमें तकवा, परहेजगारी के साथ-साथ अनुशासन भी सिखाता है, अल्लाह का एहसान है कि उसने हमें माहे रमजान का बेशकीमती तोहफा दिया और ऐसी कद्र वाली रात( शब-ए-कद्र ) भी दी, जिसकी इबादते हजार सालों की इबादतों से कही ज्यादा अफजल हैं।
शब-ए-कद्र में वो सारी रात जागना और फिर ईद की रौनकें और वो खुशियां सभी बेहद यादगार लम्हे हैं। 'बेशक ये सब हम सभी की खुशनसीबी है और एहसान है उस मालिक का जिसने हमें उस नबी का उम्मती बनाया है और कलमा पढ़ाया, जो अल्लाह के नजदीक सबसे ज्यादा मेहबूब है, और मैदाने महशर में जो तमाम नबियों और रसूलो के सरदार होंगे, जो अल्लाह से सभी की मगफिरत और बक्शीश भी करवाएंगे।'

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