क्या नीतीश कुमार सही में अब सुशासन बाबू नहीं रहे या सच कुछ और है ? - .

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Sunday, 1 April 2018

क्या नीतीश कुमार सही में अब सुशासन बाबू नहीं रहे या सच कुछ और है ?

क्या नीतीश कुमार सही में अब सुशासन बाबू नहीं रहे या सच कुछ और है ?

बिहार से इन दिनों अच्छी ख़बर नहीं आती. एक बार फिर राज्य नेगेटिव ख़बरों के कारण अब ज़्यादा सुर्ख़ियां बटोरता है. ख़ासकर जब भी राज्य में कुछ ग़लत होता है अख़बारों से लेकर राष्ट्रीय से लेकर न्यूज़ चैनल में एक सामान्य हेड्लायन या सवाल उठाया जाता हैं कि बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार अब सुसासन बाबु नहीं रहे. लेकिन फ़िलहाल जानते हैं कि ऐसा क्या हुआ हैं कि ये बहस ना केवल शुरू हुई लेकिन इसकी  तेज़ी भी कुछ बढ़ गयी है. ताज़ा जो राज्य में घटनाचक्र चला है 
जिसकी शुरुआत भागलपुर से दो हफ़्ते पहले हुई जब केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के पुत्र और भाजपा के पिछले विधानसभा चुनाव में भागलपुर शहर से उम्मीदवार अरिजित शाश्वत ने नव वर्ष के पूर्व संध्या पर एक जुलूस निकाला. इस जुलूस के बारे में पिता-पुत्र ने माना कि ज़िला प्रशासन से उन्हें परमिट नहीं मिला था. लेकिन शाश्वत ने अपने तय कार्यक्रम से इस यात्रा को निकाला और सरकारी वक़ील के अनुसार इस जुलूस में चल रहे डीजे को एक चिप दिया जिसमें उत्तेजक नारे थे 
जिसके कारण माहौल ख़राब हुआ और एक बार फिर संप्रदायिक तनाव बढ़ा सरकार ने या कहिये ज़िला प्रशासन ने उनके ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज की. साक्ष्य आने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले में रुचि दिखानी शुरू की. सबसे पहले उन्होंने कहा कि जिसने क़ानून तोड़ा उसके ख़िलाफ़ कारवाई होगी. इसके बाद शाश्वत के ख़िलाफ़ पलीस ने गिरफ़्तारी का वॉरंट के लिए अर्ज़ी दी. कोर्ट ने केस डायरी देखने के बाद उनकी ज़मानत याचिका शनिवार को ख़ारिज भी की. नीतीश के तेवर को देखते हुए भाजपा के बिहार इकाई के वरिष्ठ नेता सबको भरोसा देते रहे कि इस मामले में ज़मानत याचिका ख़ारिज होने पर वो सरेंडर करेंगे. अरिजित शाश्वत ने पटना के एक मंदिर के पास नाटकीय घटनाक्रम में सरेंडर के साथ गिरफ़्तारी भी दी.

किन शाश्वत प्रकरण जब चल रहा था तब तक रामनवमी भी आ गया. हालांकि नीतीश कुमार को एक कुशल प्रशासक की तरह अंदेशा हो गया था कि इस बार सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश होगी. उन्होंने पुलिस को सतर्कता बरतने की सलाह दी. जिसके कारण एक मुस्लिम वृद्ध ने मधुबनी में मुझे पिछले रविवार को कहा कि जब राजा ख़ुद रातजगा हमारे सुरक्षा के लिए कर रहा है तब हम चैन की नींद सो सकते हैं.
लेकिन बिहार में रामनवमी के दौरान जो कुछ भी देखने को मिला उससे एक साज़िश और तैयारी की बू आम लोगों को भी महसूस हो रही है. जैसे लोग जितनी बड़ी संख्या में तलवार, हॉकी स्टिक लेकर निकले वो बिहार की भगवान राम को पूजा करने की संस्कृति नहीं रही. उसके अलावा सवाल ये था कि इतनी बड़ी संख्या में लोग रामनवमी का जुलूस कैसे निकालने लगे. लेकिन रविवार से घटना होने लगी. ख़ासकर औरंगाबाद शहर में. वहां प्रशासन के तमाम दावों के बावजूद सोमवार को एक ही समुदय के लोगों की दुकान में आग लगायी गयी.


लेकिन अब मूल सवाल है कि नीतीश क्या अभी भी सुशासन बाबू हैं या जैसा कि एक चैनल ने कहा कि जंगल राज के सुशासन बाबू होकर सिमट गए हैं. नहीं ये तमग़ा अभी छिनना थोड़ा जल्दी होगा. ये सब कुछ नीतीश कुमार के कुछ निर्णय के ऊपर निर्भर करता है कि क्या इस तनाव के पीछे के लोगों की गिरफ़्तारी करा कर वो अपने काम की इतिश्री कर लेते हैं या उन्हें सज़ा भी दिलाते हैं. इससे भी अधिक अपने पुलिस महानिदेशक, जो अररिया के नक़ली बीडीओ की तुरंत गिरफ़्तारी करा कर न्यूज़ चैनल पर उसका श्रेय लेने में कोई देरी नहीं दिखाते, उनसे कैसे अपने सुशासन के अजेंडा पर काम कराते हैं, ये नीतीश के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.

आने वाले दिनों में अरिजित शाश्वत का मामला एक टेस्ट होगा. अगर वो जेल जाता है और फिर बाहर आकर अपनी राजनीतिक दुकान लगाने में कामयाब होता है तब नीतीश कुमार की राजनीतिक हैसियत और कम होगी. उनका इक़बाल और ख़त्म होगा. लेकिन अगर उनके और उनके समर्थक लोगों को सही में नीतीश उनकी ग़लतियों के लिए सज़ा दिलाने में कामयाब होते हैं तो सुशासन बाबू का तमग़ा कोई उनसे फ़िलहाल नहीं छिन नहीं सकता. लेकिन फ़िलहाल इस पर बहस तो जारी रहेगा.

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