ग़रीबों की जगह ना दिल में, ना शहरों में - .

Breaking

Tuesday, 27 March 2018

ग़रीबों की जगह ना दिल में, ना शहरों में

ग़रीबों की जगह ना दिल में, ना शहरों में


शहर वही सबसे अच्छा होता है जो सबके लिए होता है. जिसकी हर जगह पर सबका दावा होता है. मुंबई को लोगों ने बनाया क्योंकि मुंबई पर सबका दावा था. दावा है. मुंबई के फुटपाथ की कहानी फिल्मों में और साहित्य में घर के रूप में आती है, एक ठिकाने के रूप में जहां से उठकर कोई आसमान में सितारा बन जाता है. श्री 420 से लेकर दीवार और तेजाब. न जाने कितनी फ़िल्में हैं. जब उसी मुंबई में कोई अपनी दुकान के बाहर खाली जगह में लोहे कीलें लगवा दे, तो वह कील मुंबई की आत्मा में ठोंक देता है. तभी जब ट्विटर पर कील की तस्वीर आई तो उन लोगों को सदमा लगा जो मुंबई की आत्मा में यकीन रखते हैं.

वैसे तो इन कीलों को अब हटा दिया गया है लेकि इसे लगाने के पीछे का इरादा कितना असंवेदनशील रहा होगा. शटर गिराने के बाद जो जगह बची होती है उसे ओट कहते हैं, वहां लोग बैठ जाते हैं. थक जाते हैं तो टिक जाते हैं. एचडीएफसी बैंक के फोर्ट रोड ब्रांच के बाहर कीलें लगाई गईं, जिन्हें अब बैंक ने हटा लिया है. बैंक ने अफसोस भी ज़ाहिर किया है. कील पहले से थीं मगर नए निर्माण के बाद बड़ी कर दी गई. ये कीलें भयानक हैं, बहुत दिनों तक शहर में ग़रीबों के लिए स्पेस को लेकर अध्ययन करने वालों के ज़हन से नहीं हटेंगी. चुभती रहेंगी. आज का शहरी भारत क्या इतना ग़रीब विरोधी होता चला जाएगा, दरसअल होता चला जा रहा है. खुद पेवमेंट की ज़मीन को पार्किंग के लिए हथिया लेता है, कालोनी के सार्वजनिक रास्तों पर लोहे का गेट लगा देता है मगर हम इस हद तक पहुंचेंगे कि बैठने की जगह पर कील लगा देंगे ताकि इस तरह कोई थका मांदा थोड़ी सी जगह पाकर बैठ न जाए.

भारत ही नहीं दुनिया के तमाम बड़े शहरों में बेघर रहते हैं. मौसम की मार झेलते हुए किसी पार्क में, किसी पेड़ के नीचे, किसी फ्लाईओवर के नीचे अपने ठिकाने बना लेते हैं. बहुत से लोग इन्हें गंदगी के रूप में देखते हैं, अतिक्रमण के रूप में देखते हैं, कानून व्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं. आप क्या करेंगे, अमरीका का एक शहर है कैलिफोर्निया, यह शहर टैक्स के कारण बहुत महंगा हो गया है. इतना महंगा कि घर वाले बेघर हो जाते हैं. कार में रात गुज़ारते हैं और अपना मकान बेचकर दूसरे शहर की तरफ भाग रहे हैं. जुलाई 2016 से जुलाई 2017 के बीच 1 लाख 38 हज़ार लोगों ने कैलिफोर्निया शहर छोड़ दिया. इसलिए बेघर को देखकर नाक भौं सिकोड़ने की ज़रूरत नहीं है, जिनके घर हैं वे भी बेघर हो सकते हैं. पर वहां का समाज किस तरह से अपने बेघरों को देखता है. सिएटल पेसिफिकल यूनिवर्सिटी ने बेघरों से कहा कि आप सर्दी के 90 दिनों के लिए हमारे कैंपस में आकर रहें, वहां अपना कैंप लगा लें. उसके बाद वाशिंगटन यूनिवर्सिटी ने भी ऐसा किया है. क्या आपने भारत में किसी यूनिवर्सिटी को ऐसा करते देखा है कि सर्दी के दिनों में बेघरों के लिए अपना कैंपस खोल दे. सिएटल पेसिफिक यूनिवर्सिटी ने अपने पार्किंग में 65 बेघरों को कैंप लगाने के लिए जगह दे दी थी. हम हैं कि कील लगा रहे हैं. बेहतर है कि हम ऐसे शहर की कल्पना करें जो बेघरों को लेकर उदार हो. उनका ख़्याल रखता है. तभी तो सर्दी के दिनों में सरकार रैन बसेरा बनाती है तो सबको अच्छा लगता है. अब आपने मुंबई में एचडीएफसी शाखा के बाहर कीलें देखी लेकिन क्या यह दिल्ली में नहीं हो रहा है. दिल्ली में भी हो रहा है मगर दूसरी तरफ से.

No comments:

Post a Comment

Pages