मुद्रा योजना के तहत कर्ज़ देने का दबाव खड़ा कर सकता है नया घोटाला, सरकार ने किया इनकार - .

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Wednesday, 28 February 2018

मुद्रा योजना के तहत कर्ज़ देने का दबाव खड़ा कर सकता है नया घोटाला, सरकार ने किया इनकार

मुद्रा योजना के तहत कर्ज़ देने का दबाव खड़ा कर सकता है नया घोटाला, सरकार ने किया इनकार



पंजाब नेशनल बैंक (PNB) घोटाले के बाद ये सवाल उठ रहा है कि सरकारी बैंकों में कहां कहां दरार है. अप्रैल 2015 में शुरू की गई मुद्रा लोन योजना को केंद्र सरकार ने अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया है लेकिन एनडीटीवी इंडिया ने कई ऐसे बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों से बात की जिनमें मुद्रा लोन के तरीके को लेकर बहुत असंतोष है. उड़ीसा में इलाहाबाद बैंक के प्रबन्धक राजीव पटनायक (बदला हुआ नाम) इस बात से बहुत नाराज हैं कि मुद्रा लोन के तहत उन पर कर्ज़ के लिये दबाव बनाया जा रहा है. 'हमें मुद्रा योजना के तहत ग्राहक के प्रोफाइल की जांच किये बगैर टार्गेट पूरा करने को कहा जा रहा है.' पटनायक ने कहा- पटनायक के मुताबिक 'बैंक में वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों का प्रमोशन बिजनेस टार्गेट पूरा करने पर टिका होता है और ये अधिकारी मुद्रा लोन पर पूरा ज़ोर लगा रहे हैं कि क्योंकि इस कर्ज़ में किसी तरह की गारंटी नहीं ली जाती है.'

महत्वपूर्ण है कि पिछले हफ्ते 21 फरवरी को सीबीआई ने पीएनबी में ही मुद्रा लोन घोटाले को लेकर मुकदमा दर्ज किया है. जांच एजेंसी ने जो एफआईआर दर्ज की है उसके मुताबिक राजस्थान की बाड़मेर में पीएनबी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुद्रा लोन के कुल 26 मामलों में करीब 62 लाख रुपये का घपला किया है.



केंद्र सरकार ने 2015 में मुद्रा लोन योजना की शुरुआत की ताकि छोटे व्यापारियों को 10 लाख तक के कर्ज कम ब्याज दर और बिना किसी गारंटी के तुरंत  मिल सके. इस के तहत मिलने वाले कर्ज तीन श्रेणियों में बांटे गए है- पहली श्रेणी में 50,000 तक का कर्ज दिया जाता है. ऐसे कर्ज अकसर ग्रामीण इलाकों में दिए  जाते हैं. इसके बाद दूसरी श्रेणी में 50,000 से 5 लाख तक और तीसरी मे 5 से 10 लाख तक के कर्ज दिए जाते है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्वरोज़गार को बढ़ावा देना है. हालांकि योजना की शुरुआत के बाद एमएसएमई सेक्टर को दिये जाने वाले तकरीबन सारे कर्ज़ इसी श्रेणी में डाल दिये जा रहे हैं.

दिल्ली में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मुद्रा लोन वितरण का काम देख रहे एजीएम स्तर के अधिकारी ने कहा, 'ये बेहद सरल और बिना झंझट और झमेले के कर्ज देने वाली योजना है. हम अपनी बैंक शाखाओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वह अधिक से अधिक कर्ज़ इस स्कीम के तहत दें' हमने जब इस अधिकारी से पूछा कि क्या बैंक अधिकारियों पर रिस्की लोन देने और बिना पूरी जानकारी के कर्ज़ देने के लिये दबाव नहीं बनाया जा रहा तो जवाब मिला,' घपला करने की नीयत हो तो गड़बड़ी कोई भी कर सकता है. अमूमन छोटे कर्जदार ईमानदार होते हैं और कर्ज़ वक्त पर लौटा देते हैं.'

हालांकि एनडीटीवी इंडिया ने ज़मीन पर जो पड़ताल की उसमें कई बैंक अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि मुद्रा लोन के तहत सरकारी योजना का फायदा उचित लाभार्थी तक पहुंचाना होना चाहिये लेकिन अक्सर ये क़र्ज़ जरूरतमन्दों के बजाय उन लोगों को दिया जाता है जो पहले से व्यापारी हैं.

मुद्रा वेब साइट बताती है कि अब तक कुल साढ़े चार लाख करोड़ से अधिक (कुल 4.82 लाख करोड़) कर्ज मुद्रा योजना के तहत दिये जा चुके हैं. सरकार ने अपने आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय वर्ष 2015-16 में 1.32 लाख करोड़ के मुद्रा लोन वितरित किये गये. उसके बाद 2016-17 में मुद्रा योजना के तहत 1.75 लाख करोड़ से अधिक रकम के कर्ज दिये गये और वित्तीय वर्ष 2017-18 में 1.75 लाख करोड़ के मुद्रा लोन बांटे जा चुके हैं.

मुद्रा लोन में जहां लाभार्थियों को बिना झंझट कर्ज मिल रहा है वहीं बाड़मेर की घटना योजना के दुरुपयोग की शंकाओं को सही साबित कर रही है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने पिछले साल दावा किया था कि मुद्रा योजना की शुरुआत के बाद दो साल के भीतर 7.28 करोड़ लोगों को स्वरोज़गार मिला लेकिन पंजाब स्थित स्टेट बैंक ऑफ पटियाला के एक बैंक अधिकारी ने बताया, 'कई मामलों में रसूखदार लोग और सत्ता से जुड़े लोग अपने करीबियों को ये कर्ज़ दिला रहे हैं. मुद्रा लोन में बैंक गारंटी न होने से एनपीए की रिकवरी का अमूमन कोई रास्ता नहीं बचता.'

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