प्राइम टाइम इंट्रो : बनारस, दरभंगा के संस्कृत महाविद्यालय का बुरा हाल - .

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Thursday, 12 October 2017

प्राइम टाइम इंट्रो : बनारस, दरभंगा के संस्कृत महाविद्यालय का बुरा हाल

प्राइम टाइम इंट्रो : बनारस, दरभंगा के संस्कृत महाविद्यालय का बुरा हाल

बीस सालों में यूनिवर्सिटी और कॉलेज सिस्टम को बर्बाद नहीं किया गया होता तो आज भारत के लोकतंत्र में व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का इतना रोल नहीं होता. दंगा कराने से लेकर फेक न्यूज़ फैलाने वाली व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से जुड़ नौजवान से लेकर नागरिक तक ख़ुद को शिक्षित समझने लगे हैं. इस यूनिवर्सिटी ने जितना जवाहर लाल नेहरू का इतिहास बदला है, उतना तो उनके नाम पर बनी जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी भी इतिहास नहीं बना सकी है. आवश्यकता है कि हम कॉलेज के कैंपस को नए सिरे से परिभाषित करें. इसे गोदाम कहना ठीक होगा जहां तीन चार साल के लिए नौजवानों को रोक कर रखा जाता है ताकि वे भूल से भी ज्ञान हासिल न कर सकें. कई शिक्षकों ने लिखा है कि छात्र भी नहीं आते हैं, यह बात भी सही है, बिहार से एक शिक्षिका ने लिखा है कि छात्र के न आने पर हौसला टूट जाता है मगर छात्र आने भी लगे तो उनके लिए न तो क्लास रूम है, न प्रोफेसर. छात्र भी वाइसी वर्सा की तर्ज़ पर यही कहते हैं कि जाते हैं तो पढ़ाने वाला नहीं मिलता.
छात्र और शिक्षक भले एक दूसरे से न मिल पाएं मगर कॉलेज की इमारत आपको हमेशा मिलेगी. भले ही वह जर्जर हो चुकी हो, उसके निशान अभी तक किसी ने नहीं मिटाए हैं. इससे ज्ञात होता है कि हम कॉलेज की निशानियों से प्यार करते हैं. अब देखिये भारत भर में घूम घूम कर प्रोफेसर, प्रिंसिपल का अटेंडेंस चेक कर रहे थे, मगर पता चला कि यूनिवर्सिटी को अनुदान देने के लिए बने आयोग में ही चोटी के प्रमुख एबसेंट हैं. 3 अक्टूबर 2017 की रिपोर्ट है इंडियन एक्सप्रेस के ऋतिका चोपड़ा की, इसके अनुसार यूजीसी में भी 3 अप्रैल के बाद से स्थायी चेयरमैन नहीं आया है. वेद प्रकाश गुप्ता के बाद वीएस चौहान कार्यकारी चेयरमैन बने हैं. नियमानुसार वाइस चेयर मैन को चेयरमैन का प्रभार लेना चाहिए मगर आयोग के सदस्य को अस्थायी चेयरमैन बना दिया गया क्योंकि वाइस चेयरमैन का कार्यकाल एक महीना पहले ख़त्म हो चुका था.

6 महीने से यूजीसी के चेयरमैन की नियुक्ति नहीं हुई है. मार्च महीने से वाइस चेयरमैन का पद भी ख़ाली है. 2 अक्टूबर को टेलिग्राफ ने रिपोर्ट छापी है कि अगस्त महीने से सचिव का पद भी ख़ाली है. आप चाहें तो वो गाना सुन सकते हैं, ख़ाली हाथ शाम आई है, ख़ाली हाथ जाएगी. सुनते सुनते बनारस चलते हैं. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय. इस कॉलेज की स्थापना 1791 में की गई थी, इसके शुरू के चारों प्रिंसिपल अंग्रेज़ ही थे. 1958 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने यूनिवर्सिटी का रूप दे दिया.

इस कॉलेज की इमारत देखिएगा, ऐसा लगेगा आप बनारस और क्योटो नहीं, लंदन आ गए हैं. बहुत कम कॉलेज होंगे जिनकी इमारत इसके जैसे होगी. गॉथिक शैली में बनी इस कॉलेज की इमारत में कोई बड़ा नेता नहीं जाएगा क्योंकि जाने से पहले बहुत काम करना होगा. यह इमारत आज तक अपने दम पर टिकी हुई है, जैसे संस्कृत अपने दम पर आज तक टिकी हुई है. आधुनिक संस्कृत शिक्षा का इतिहास इस कॉलेज के इतिहास से शुरू होता है. 1791 में लॉर्ड कार्नवालिस ने इसकी मंज़ूरी दी थी और प्रस्ताव था ईस्ट इंडिया कंपनी के जोनाथन डंकन का. पंडित काशीनाथ इसके पहले शिक्षक हुए थे. डॉक्टर वैलेंटाइन ने यहां आंग्ल संस्कृत विभाग की स्थापना की थी. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के मंत्री, नेता और उनके समर्थकों के लिए बता दूं कि ये वो वैलेंटाइन नहीं हैं जिनका वे हर 14 फरवरी को विरोध करते हैं. डॉ. आर टी एस ग्रीफिथ इसके पहले प्रिंसिपल बने. ग्रीफिथ ने ही बाल्मीकि रामायण का अनुवाद अंग्रेज़ी में किया था. डॉक्टर गंगा नाथ झा के समय में भी यहां काफी काम हुआ था

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