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केडी जाधव: पहला ओलिंपिक मेडल लाने वाले इस पहलवान को जीतेजी नहीं मिला सम्मान

केडी जाधव: पहला ओलिंपिक मेडल लाने वाले इस पहलवान को जीतेजी नहीं मिला सम्मान 

ज्यादातर लोगों से अगर पूछा जाए कि बिना गूगल पर सर्च किए बताएं कि भारत को ओलिंपिक खेलों में किस इवेंट में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत मेडल मिले हैं? लोग झट से उंगलियों पर गिनेंगे और शूटिंग और कुश्ती का नाम लेंगे. दोनों ही इवेंट्स में भारत को चार-चार ओलिंपिक मेडल मिले हैं. लेकिन जरा ठहरिए...ओलिंपिक में भारत को कुश्ती के इवेंट में चार नहीं बल्कि पांच मेडल हासिल हुए हैं.
सुशील कुमार के दो कांस्य और सिल्वर मेडल ( 2008,2012), योगेश्वर दत्त का कांस्य (2012) और साक्षी मलिक के कांस्य (2016) के अलावा भारत को कुश्ती में एक और मेडल मिला था. और वह मेडल जीता था पहलवान खशाबा दादासाहेब जाधव ने. केडी जाधव के नाम से मशहूर महाराष्ट्र के इस पहलवान ने साल 1952 के हेलसिंकी ओलिंपिक में कांस्य पदक हासिल किया था और यह पदक ओलंपिक खेलों में आजाद भारत का पहला व्यक्तिगत पदक था.
केडी जाधव के मेडल के 44 साल बाद मिला भारत को दूसरा मेडल
उस वक्त ओलिंपिक मेडल जीतना कितना अहम था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केडी जाधव के मेडल के बाद भारत को ओलिंपिक में दूसरा व्यक्तिगत मेडल 44 साल बाद हासिल हो सका जब लिएंडर पेस ने 1996 के अटलांटा ओलिंपिक में कांस्य पदक हासिल किया.
देश को पहला व्यक्तिगत ओलिंपिक मेडल दिलाने वाले कशाबा जाधव की कहानी बेहद दिलचस्प है. महाराष्ट्र के सतारा के एक गांव गोलेश्वर ताल में 15 जनवरी 1926 को जन्मे खशाबा के पिता खुद पहलवान थे. भारत के बाकी गांवों की तरह उनके गांव में भी कुश्ती एक पारंपरिक खेल था. कुश्ती के साथ-साथ केडी जाधव को पढ़ाई का भी शौक था और उस दौर में उन्होंने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की थी
कड़े संघर्ष के बाद मिली थी ओलिंपिक में एंट्री
1948 के लंदन ओलिंपिक में, आजाद भारत पहली बार ओलिंपिक खेलों में भागीदारी कर रहा था. उस वक्त ओलिंपिक में कुश्ती का खेल मैट पर होना शुरू हो गया था. जीवन भर मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास करने वाले केडी जाधव के लिए यह एकदम नया अनुभव था और अपने पहले ही ओलिंपिक में वह छठी पोजिशन पर रहे.
लंदन में वह मेडल नहीं जीत सके लेकिन उन्हें इंटरनेशनल कुश्ती का अनुभव हो गया. इसके चार साल बाद जब हेलसिंकी ओलिंपिक के लिए ट्रायल जीतने के बाद उनका चयन नहीं किया गया तब उन्होंने उस वक्त आईओए से अध्यक्ष और पटियाला के महाराज से शिकायत करके एक निष्पक्ष ट्रायल की मांग की. ट्रायल हुआ और बंगाल के पहलवान निरंदास को मात देकर वह हेलसिंकी के लिए रवाना हुए.
जीते जी नहीं मिला सरकार से कोई सम्मान
हेलसिंकी के बाद वह अगले ओलिंपिक के लिए भी तैयारी करना चाहते थे लेकिन घुटने की चोट के चलते ऐसा नहीं हो सका. हेलसिंकी ओलिंपिक के बाद वह महाराष्ट्र पुसिल में नौकरी करने लगे. इस दौरान भी वह कुश्ती के साथ जुड़े रहे और पुलिस गेम्स भाग लेते रहे. संन्यास के बाद वह नए पहलवानों को हमेशा कुश्ती के गुर सिखाते रहते थे. देश में कुश्ती को बढ़ावा देने के लिए वह एक एकेडमी खोलना चाहते थे. लेकिन पैसों की कमी के चलते ऐसा नहीं हो सका. आज ही के दिन यानी 14 अगस्त 1984 को कुश्ती की एकेडमी का सपना आंखों में लिए वह इस दुनिया से विदा हो गए.
विडम्बना देखिए,  देश को पहला व्यक्तिगत ओलंपिक मेडल दिलाने वाले केडी जाधव को उनके जीते जी सरकार ने खेलों के पुरस्कार अर्जुन अवॉर्ड से नवाजना भी मुनासिब नहीं समझा. मौत के 16 साल बाद उन्हें अर्जुन अवॉर्ड (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया.साल 2010 में दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में कुश्ती के हॉल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया.
कुश्ती की एकेडमी खोलने के उनके ख्वाब को पूरा करने किए उनके परिवार ने हाल ही में उनके द्वारा जीते गए ओलंपिक के कांस्य पदक को भी नीलाम करने की बात भी कही. जिसके बाद मीडिया में केडी जाधव का नाम चर्चा में आया. हालांकि अब खबर है कि महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें मेडल की नीलामी ना करने के लिए राजी कर लिया है. ऐसे में अब उम्मीद है कि जल्दी ही महाराष्ट्र में उनके नाम से वह एकेडमी खुल जाएगी जिसका सपना उन्होंने देखा था.


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