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'मुबारकां' को तारीफ तो मिली पर कमाई नहीं, क्यों? ये हैं 5 वजहें

'मुबारकां' को तारीफ तो मिली पर कमाई नहीं, क्यों? ये हैं 5 वजहें 

 नई दिल्ली: 'वेलकम बैक', 'वेलकम', 'सिंह इज किंग' और 'रेडी' जैसी हिट फिल्में देने वाले अनीस बज्मी के दिल में एक रंज था कि उनकी फिल्में हिट तो रहतीं, लेकिन क्रिटिक्स से उन्हें सराहना के दो शब्द सुनने को नहीं मिलते. लेकिन इस बार क्रिटिक्स ने उनकी फैमिली एंटरटेनर 'मुबारकां' की दिल खोलकर तारीफ की. बावजूद इसके जनता सिनेमाघरों तक इस फिल्म को देखने नहीं पहुंच सकी. वे कहते हैं, "मैं ऐसी फिल्में बनाता हूं जो सबको पसंद आए और उसका ऑडियंस सीमित न हो." आखिर 'मुबारकां' में सब सही था तो गड़बड़ कहां हुई? आइए हम बताते हैं आपको...

पिक्चर महंगी है
फिल्म का बजट लगभग 50-55 करोड़ रु. बताया जाता है जबकि फिल्म पिछले पांच दिन में सिर्फ 29.91 करोड़ रु. ही कमा सकी है. फिल्म विश्लेषक अतुल मोहन कहते हैं, "फिल्म की कॉस्ट कवर हो जाएगी." लेकिन हिट और फ्लॉप का पैमाना तो थिएटर बिजनेस होता है.

पंजाबी कुछ ज्यादा हो गई
फिल्म विश्लेषक मानते हैं कि फिल्म में पंजाबियत का पुट कुछ ज्यादा ही हो गया था. बॉलीवुड का फोकस नॉर्थ इंडिया रहता है, लेकिन 'मुबारकां' के टाइटल से लेकर आत्मा तक में पंजाब का रंग घुला था. इस वजह से ऑडियंस थोड़ा कट गया.

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म्यूजिक पॉपुलर नहीं हुआ
फिल्म का म्यूजिक पूरी तरह से पुराने जमाने के गानों पर टिका था. हवा हवा से लेकर शान फिल्म के गाने तक को इसमें समेटा गया था. ऐसे में सुने-सुनाए गाने कितने अच्छे लग सकते हैं, यह सोचने वाली बात है.

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अर्जुन कपूर का खराब टाइम
अर्जुन कपूर ने अपनी पिछली फिल्म 'हाफ गर्लफ्रेंड' में बिहारी युवा का रोल किया था, जिसमें वे मिस फिट रहे थे और फिल्म औंधे मुंह गिर गई थी. अर्जुन को थोड़ी जरूरत अपने स्किल्स को निखारने की है, क्योंकि कॉमेडी के लिए परफेक्ट टाइमिंग चाहिए होती है और वे उनमें मिसिंग है. उन्हें इस पर थोड़ा काम करना चाहिए.

प्रमोशन में रही खामी?
फिल्म में अर्जुन कपूर, इलिया डी’क्रूज और अथिया शेट्टी जैसे नए कलाकार थे. ऐसे में फिल्म का फोकस अर्बन टेरीटरीज और मल्टीप्लेक्सेस को रखा गया. जिस वजह से सिंगल स्क्रीन ऑडियंस उस तरह से कनेक्ट नहीं कर सकी और कुछ हद तक उसकी अनदेखी हुई. फिर प्रमोशन भी काफी लिमिटेड अंदाज में हुआ.

..और भी हैं बॉलीवुड से जुड़ी ढेरों ख़बरें...
 
 
 

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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