'मेड' इन इंडिया: कामवाली बाई से बर्बरता उन्हें मनुष्य नहीं मानने का प्रमाण - .

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Wednesday, 19 July 2017

'मेड' इन इंडिया: कामवाली बाई से बर्बरता उन्हें मनुष्य नहीं मानने का प्रमाण

'मेड' इन इंडिया: कामवाली बाई से बर्बरता उन्हें मनुष्य नहीं मानने का प्रमाण 
नोएडा के महागुन मॉडर्न सोसाइटी में मैडम और मेड के दरम्यान क्या हुआ? घटना के विभिन्न ब्योरों में अलग-अलग तस्वीरों से यह एक पहेली बन गई है.
सेठी परिवार के शाही आवास में मंगलवार को घरेलू सहायक ज़ोहरा बीबी करीब दो महीने के काम का बकाया मांगने पहुंची. बुधवार की सुबह पड़ोसी झुग्गीबस्ती के सैकड़ों मजदूरों का समूह सोसाइटी आ धमका, जो बीबी को खोज रहा था.
इसके बाद यहां दंगे जैसे हालात बन गए. लाठियों और पत्थर से लैस मजदूरों ने बीबी को खोजते हुए सेठी के आवास पर पत्थरबाजी की.
हालात बेकाबू होता देख यूपी पुलिस को बुलाया गया. जिसके बाद बीबी को बिल्डिंग के एक कमरे से छुड़ाया गया. अगर अंशु सेठी की मानें तो वह वहां चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराए जाने के बाद या डर से भाग कर छिपी हुई थी. और अगर बीबी का दावा सही है तो उसे रात भर सिर्फ इसलिए बंदी बना कर रखा गया क्योंकि उसने बकाए वेतन की मांग की थी.
माना जा रहा है कि महागुन मॉडर्न सोसायटी ने बीबी की कॉलोनी से मेड रखने पर प्रतिबंध लगा दिया है. इस वजह से सैकड़ों जिंदगियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. दुखद बात ये है कि उपनगरीय आवासीय कॉम्पलेक्स की इस खबर में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे कोई प्रेरणा ली जा सके.
वास्तव में जो श्रमिक डरे हुए थे, कुछ घंटों में ही वह फसाद फैलाने वाली ऐसी भीड़ में बदल गई मानो वह क्रूरतम मॉब लिंचिंग को अंजाम देने वाली बांग्लादेशी मुसलमानों की भीड़ हो. (जैसे 2016 में पश्चिम बंगाल का कालीचक दंगा दोबारा घटित हो रहा हो.)
कैसे ये झगड़ा खतरनाक धार्मिक उन्माद में बदल गया
आज जो लोग भारत और भारतीय आदर्शों को गलत सूचनाओं और प्रतिशोध की भावना के बीच बदलते महसूस कर रहे हैं, उनके लिए यह बात नई नहीं है कि किस तरह एक झगड़ा खतरनाक धार्मिक उन्माद में बदल गया.
आखिरकार यह सब है क्या, जो गरीब मजदूरों की नागरिकता के लिए इतना ज्यादा प्रासंगिक हो गया है? बीबी के साथ कथित बर्बरता या संभ्रांत परिवार में काम कर रही दूसरी कामवालियों के साथ बुरे बर्ताव का निहितार्थ ये है कि मानवता से बड़ी चीज नागरिकता है. ऐसा लगता है कि लोगों का बांग्लादेशी होना ही हमारे लिए उन पर शोषण करने के लिए न्यायोचित आधार हो गया है, चाहे यह आधार आर्थिक अधिकार हो या मानवाधिकार.
राष्ट्रवाद के अर्थ से जुड़े सवालों को यह बड़े फलक पर ले जाता है और ऐसी नागरिकता कभी भी उस देश में मान्य नहीं हो सकती, जहां के लोगों ने नियमित रूप से प्रवासियों और रिफ्यूजियों के खिलाफ मतदान किया हो. वे लोग उन्हें सिर्फ घुसपैठिये के तौर पर ही देख सकते हैं.
मामले में बीबी की झुग्गियों में कई बार छापेमारी हो चुकी है, कई लोग हिरासत में लिए गए और उनकी गिरफ्तारियां भी हुई हैं. लेकिन इससे हटकर देखें तो महागुन मॉडर्न सोसाइटी के लोग इस पूछताछ और जांच से दूर निश्चिंत होकर आराम और सुविधा की जिंदगी जी रहे हैं.
'मेड और मैडम' पहली बार आमने-सामने
सुहासिनी राज और एलेन बैरी ने इस समस्या को काफी हद तक बहुत सही रूप में व्यक्त किया है, 'यह व्यवस्था (मैडम और मेड के बीच वाली) पूरे भारत में सौहार्द्रपूर्ण और स्थाई रूप से दशकों से है. लेकिन बुधवार की सुबह मालकिन और कामवालियां ‘युद्ध के मैदान’ में आमने-सामने खड़ी हो गई.'
हालांकि महागुन मॉडर्न की घटनाओं की सीरीज इसे युद्ध के रूप में बयां करती है लेकिन यह युद्ध बराबरी के स्तर पर नहीं लड़ा गया. यह करीब-करीब सौहार्द्रपूर्ण सामंजस्य में कमी को जताता है. छुआछूत की बात को अलग भी रखें, तो दशकों से मध्यमवर्ग ने अपनी जाति का जिक्र करने से बचने की कोशिश की है. जाति को याद किया जाना जरूरी है ताकि वंचित तबकों और सामाजिक समूहों के लिए आर्थिक अवसरों और उनके साथ भेदभाव को रोका जा सके.
ऐसा करने के पीछे यह उम्मीद और विश्वास है कि जातियां इस दुनिया की अवशेष हैं और यह किसी के इतिहास के साथ भेदभाव नहीं करेगा. लेकिन, सच ये है कि जाति अभी जिंदा है.
यह उस भाषा में है जो हम बोलते हैं. यह हमारी शिक्षा, हमारे कामकाज और हमारे समुदायों में है. भारतीय मध्यम वर्ग, ऊंची जातियां अपने घरेलू सहायकों के साथ जैसा व्यवहार करती हैं, उनके काम को पहचान देने से इनकार करती हैं और उन्हें उनका अधिकार, सही वेतन, सामाजिक मान्यता और यहां तक कि काम का सम्मानजनक पद तक नहीं देतीं- उसमें भी यह भेदभाव दिखता है.
महागुन मॉडर्न जैसी सोसाइटियां नियमित रूप से बीबी और अनगिनत कामवालियों को इंसान मानने से भी इनकार करती है चाहे वे जहां से भी आती हों. आवासीय कॉम्पलेक्स के साथ-साथ बढ़ रही झुग्गी कॉलोनियां इस असमानता के दायरे को और भी ज्यादा बढ़ा रही है.


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