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जन्मदिन विशेष: नसीर...जिसका जिए जाना भी एक रवायत है

जन्मदिन विशेष: नसीर...जिसका जिए जाना भी एक रवायत है 
पहाड़ों पर रेलवे स्टेशन का एक वेटिंग रूम, जहां सर्द मौसम और बारिश के बीच फिल्म ‘इजाजत’ का एक संवाद है- ‘आदतें भी अजीब होती हैं, सांस लेना भी क्या आदत है, जिए जाना भी क्या रवायत है, जिए जाते हैं, जिए जाते हैं..’ यह संवाद नसीरुद्दीन शाह की जिंदगी के ज्यादा करीब है.
नसीरुद्दीन शाह के लिए अभिनय एक आदत बन गया है. बकौल उनके ‘मैं अभिनेता बनने के लिए पैदा हुआ था, अगर मैं अभिनेता नहीं बनता तो मर जाना पसंद करता. अभिनेता बनना आजीवन प्रतिबद्धता है. अभिनेता बनने के बारे में तभी सोचना चाहिए जब आजीवन प्रतीक्षा की क्षमता हो’. नसीर खुद को अदाकारी के उस मुकाम पर ले जा चुके हैं जहां पहुंचना आज के अभिनेताओं के ख्यालों में होता है.
वह लखनऊ के करीब बाराबंकी शहर का घोसियाना मोहल्ला था जहां आज के 67 साल पहले राजा जहांगीराबाद की आलीशान कोठी में सेना के एक अधिकारी के यहां नसीर का जन्म हुआ था. अपने जन्म की तारीख और महीने पर नसीर खुद कहते हैं कि इस बारे में उनकी अम्मी के सिवा कोई निश्चित नहीं था, अम्मी कहती थीं कि तुम रमजान में पैदा हुए थे.
थिएटर ने दिया इस दुनिया को नसीर
खुद को एक्स्प्लोर करने का साहस नसीर में शुरू से था. रंगमंच और हिंदी सिनेमा की दुनिया में आज उनकी जो शोहरत है उसका आगाज उन्होंने अपने स्कूल के दिनों में ही कर दिया था. उन दिनों उन्होंने शेक्सपीयर के नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में ‘शाईलॉक’ की भूमिका निभाई थी.
नसीर के जीवन में अदाकारी का जो बीज नैनीताल में बोया गया वह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में उस्ताद इब्राहीम अल्काजी का शागिर्द बनकर ही मुकम्मल हुआ. अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएट नसीर की अदाकारी अल्का जी की पारखी नजरों ने जल्द ही देख ली. वर्ष 1971 में नसीर ने शेक्सपीयर के ‘ओथेलो’ में ‘ब्रोबेंतियों’ और लक्ष्मीनारायण लाल के नाटक ‘सूर्यमुख’ में ‘वभ्रू’ की भूमिकाएं निभाई. अदाकारी के लिए ही पैदा हुए नसीर के नामचीन बनने की कहानी एनएसडी के दिनों से ही शुरू हो गई थी.
यहीं से रंगमंच नसीर की जिंदगी में इस कदर शामिल हुआ कि हिंदी सिनेमा की कला और व्यावसायिक दोनों धाराओं में शीर्ष पर पहुंचने के बाद भी बना हुआ है. नसीर ने ब्रेख्त के नाटक ‘काकेशियन चाक सर्किल’, गिरीश कर्नाड के ‘तुगलक’, मुद्राराक्षस के ‘तिलचट्टा’, धर्मवीर भारती के ‘अंधा युग’ से लेकर तमाम ‘एब्सर्ड’ नाटकों में अभिनय किया.
गांधी न बन पाने की थी कसक
नसीर ने रंगमंच पर खुद को सबसे ज्यादा ‘गांधी’ के चरित्र के जरिये तलाशा. फिरोज खान निर्देशित अजित दलवी के बहुचर्चित नाटक ‘महात्मा वर्सेज गांधी’ में उन्होंने अपनी ‘गांधी’ के चरित्र से जुड़ी एक कसक निकाली. असल में रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ में महात्मा गांधी की भूमिका के लिए नसीर ने ऑडिशन दिया था लेकिन उनकी जगह बेन किंग्सले को लिया गया. यहीं से नसीर के मन में एक टीस रह गई जो पूरी हुई पहले ‘महात्मा वर्सेज गांधी’ में और फिर कमल हासन की ‘हे राम’ में.
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गांधी के किरदार में डूबने के बारे में नसीर खुद कहते हैं कि मैंने बापू की तस्वीरें देखीं, उनकी तरह की आवाज के लिए मुझे अपनी आवाज की पिच बढ़ानी पड़ी, उनकी चाल-ढाल और सादगी का अभ्यास करना पड़ा.
नसीर ने बहुत बाद में उर्दू कहानियों के नाटकीय रूपांतरण में भी रूचि लेनी शुरू की. उन्होंने मंटो और इस्मत चुगताई के कई मशहूर कहानियों को मंच पर प्रस्तुत किया. इसमें मंटो की ‘इस्मत आपा के नाम’ और ‘काली सलवार’ दर्शकों के बीच सबसे ज्यादा याद किया जाने वाला मंचन रहा.
थिएटर से फिल्मों तक
रंगमंच ने नसीर के जिंदगी में पहले कदम रखा था लेकिन पुणे स्थित फिल्म संस्थान से जब उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखी तब से सिनेमा भी उनका हमसफर बन चला. यूं तो जिंदगी के सफर पर उन्हें दो हमसफर मिले, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान नसीर का दिल उम्र में लगभग चौदह साल बड़ी होने के बाद भी खूबसूरत जुल्फों वाली मेडिकल छात्रा परवीन मुराद पर आ गया था. यहीं से दोनों जिंदगी के रंगमंच पर साथ हो चले थे लेकिन यह सफर लंबा नहीं चला. बेटी ‘हीबा’ को छोड़कर परवीन ने जिंदगी के रंगमंच पर अपनी भूमिका पूरी कर ली.
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नसीर के लिए सफर अभी खत्म नहीं हुआ था. जिंदगी अपना रास्ता ढूंढ लेती है. फिल्म संस्थान के दिनों में सत्यदेव दुबे के निर्देशन में खेले गए ‘सम्भोग से संन्यास तक’ नाटक में अप्सरा बनी रत्ना पाठक से हुई दोस्ती उनकी जिंदगी की आगे की राह आसान कर देती है. इसके बाद दोनों जिंदगी के सफर पर नया आगाज करते हैं. एक बार फिर नसीर ‘न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन’ को चरितार्थ करते हैं. मजहब का फर्क और उम्र में सात साल का फासला मिट जाता है और दोनों एक हो जाते हैं.
फिल्म संस्थान ने नसीर को सिनेमा की दुनिया में पहचान दी. नसीर यहां से जन्म ले रहे ‘कला सिनेमा’ और ‘समानांतर सिनेमा’ का अभिन्न अंग बन गए. श्याम बेनेगल की फिल्म ‘निशांत’ उनकी पहली फिल्म थी जिसमें उन्होंने शोषण करने वाले जमींदार की भूमिका निभाई.
अपने किरदारों के जरिए ढूंढते थे खुद को
नकारात्मक भूमिका निभाने के साथ सिने जगत में शुरुआत करने वाले नसीर ने प्रेम, विवाह और इंसानी ख्वाहिशों के बीच उसके वजूद को तलाश करने वाले नायक के रूप में फिल्मों में काम किया है. चाहे फिल्म ‘भूमिका’ में हंसा वाडेकर (स्मिता पाटिल) के साथ एक फिल्मकार के रूप में रिश्ते का रहा हो या सईं परांजपे की फिल्म ‘स्पर्श’ में एक सुरीली आवाज के साथ जुड़ाव महसूस करने वाले अंधे व्यक्ति का.
खुद के वजूद की तलाश ही इस दौर में उनके अदाकारी का केंद्र होता था. कभी नसीर खुद को न्याय के पक्ष में खड़े वकील के रूप में गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’ में तलाशते हैं तो कभी मुंबई की झोपड़पट्टी में जिंदगी की दुश्वारियों से जूझ रहे व्यक्ति के रूप में रवींद्र धर्मराज की ‘चक्र’ में तलाशते हैं.
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अपने भीतर के अदाकार की खोज में वे कभी गैरेज मैकेनिक अल्बर्ट पिंटो (सईद मिर्जा निर्देशित अल्बर्ट पिंटू को गुस्सा क्यूं आता है) बनते हैं तो कभी सामंती और जातीय शोषण से जूझता हुआ ‘पार’ का नौरंगिया बन जाते हैं.
नसीर फिल्मों में अभिनय सिर्फ अभिनय करने भर के लिए नहीं करते हैं, बल्कि उनकी निजी जिंदगी इससे जुड़ी रहती है. फिल्म ‘मासूम’ में उनके पहली बीवी से हुए बच्चे को अपनाने के सवाल को जिस तरह सुलझाया गया है, कहीं न कहीं नसीर अपने व्यक्तिगत जीवन में भी रत्ना की मदद से ही हीबा का साथ पाते हैं.
नसीर जिंदगी के सवालों से जूझने टकराने वाले कलाकार हैं, ‘इजाजत’ से लेकर ‘कथा’, ‘मंडी’, ‘खंडहर’, ‘वो सात दिन’,  ‘बाजार’ जैसी फिल्मों में इंसान की जिस्मानी ख्वाहिशों के इर्द-गिर्द ही उन्होंने अपने पात्र को ढाला है.
अपने किरदारों को जिंदा करने वाले नसीर
कला और सार्थक सिनेमा के साथ ही नसीर मुख्यधारा की व्यावसायिक सिनेमा में भी अपनी सफल उपस्थिति दर्ज कराते हैं. सुभाष घई की ‘कर्मा’ से राकेश रोशन की ‘क्रिश’ तक उनका यह सफर जारी है. अपने अभिनय कला के दम पर ही वह कभी शायर गुलफाम हसन (सरफ़रोश) बनते हैं तो कभी ‘स्टुपिड कॉमन मैन’ (ए वेंस्डे). वे कभी भ्रष्ट पुलिसकर्मी (मकबूल) बनते हैं तो कभी टूटते और जर्जर होते सामंतशाही के प्रतीक राजासाहेब (बेगम जान).
नसीर ने अपने भीतर के कलाकार को हर आयाम में तलाशा है, निखारा है और समय के साथ संवाद किया है. नई चुनातियों को हमेशा स्वीकार किया है. गुलज़ार के ‘मिर्जा ग़ालिब’ में ग़ालिब का किरदार उनकी जीवंतता का प्रमाण है.
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हिन्दुस्तानी जुबान जिसे विरासत में मिली हो, उर्दू जिसकी ग़ालिब, मंटो, इस्मत और प्रेमचंद के अदब से मिली हो, रंगमंच ने जिसे तराशा हो और सिनेमा ने जिसे दौलत और शोहरत दी हो, जो अपनी सोच में तरक्कीपसंद हो ऐसे नसीरुद्दीन शाह को आज उनके जन्मदिन पर हम इश्क के तीसरे मक़ाम ‘मोहब्बत’ से लबरेज ‘डेढ़ इश्किया’ फिल्म के एक शेर से बधाई देते हैं-
‘तेरे वादे पे जिए हम, तो ये जान छूट जाना, कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता’...

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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