बर्थडे स्पेशलः आओ कभी हवेली पर...स्पीलबर्ग गए, पर फिर भी नहीं माने अमरीश पुरी - .

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Saturday, 1 July 2017

बर्थडे स्पेशलः आओ कभी हवेली पर...स्पीलबर्ग गए, पर फिर भी नहीं माने अमरीश पुरी


अमरीश पुरी


बर्थडे स्पेशलः आओ कभी हवेली पर...स्पीलबर्ग गए, पर फिर भी नहीं माने अमरीश पुरी

अमरीश पुरी, नाम ही काफी है. प्राण के बाद बॉलीवुड के सबसे कामयाब विलेन. लंबा कद, मजबूत कद काठी, दमदार आवाज और जबर्दस्त संवाद अदायगी. मोगैंबो का डरावना अंदाज हो या 'सिमरन' के प्यार के आगे झुकने वाला नरमदिल पिता का किरदार, हर जगह उन्होंने अपने अभिनय की बेहतरीन छाप छोड़ी.
जब हॉलीवुड पहुंचा अमरीश पुरी की हवेली
सबसे महान निर्देशकों में से एक स्टीवन स्पीलबर्ग ने उन्हें 'सर्वश्रेष्ठ विलेन' कहा था. 'इंडियाना जोंस, टेंपल ऑफ डूम्स' में उन्हें नरबलि देने वाले तांत्रिक मोलाराम के रोल में कास्ट करने के लिए स्पीलबर्ग को काफी मेहनत करनी पड़ी. स्पीलबर्ग चाहते थे कि अमरीश ऑडिशन देने अमेरिका आएं. अमरीश का कहना था कि जिसे ऑडिशन लेना है वो मुंबई आए. इसके बाद भी अमरीश ने स्पीलबर्ग की फिल्म के लिए कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. फिर जब सर रिचर्ड एटनबरो ने उन्हें कहा कि स्पीलबर्ग की फिल्में खास होती हैं तो पुरी ने वो फिल्म कर ली. वे एटनबरो के डायरेक्शन वाली ‘गांधी’ (1982) में काम कर चुके थे.
पहले स्क्रीन टेस्ट में हुए फेल, जीवन बीमा में की नौकरी
बहुत कम लोगों को मालूम है कि अमरीश पुरी को मुंबई आने के बाद संघर्ष के दिनों में एक बीमा कंपनी में नौकरी करनी पड़ी थी रंगमंच तथा विज्ञापनों के रास्ते अपनी अदाकारी का लोहा मनवाकर हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर खलनायक के रूप में मशहूर होने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब में हुआ. अपने बड़े भाई मदन पुरी का अनुसरण करते हुए फिल्मों में काम करने मुंबई पहुंचे अमरीश पुरी अपने लेकिन पहले ही स्क्रीन टेस्ट में फेल रहे और उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम में नौकरी कर ली. 
ये था अमरीश पुरी के करियर का पहला पुरस्कार
अमरीश पुरी बीमा कंपनी की नौकरी के साथ नाटककार सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों पर पृथ्वी थियेटर में काम करने लगे थे. रंगमंचीय प्रस्तुतियों ने उन्हें टीवी विज्ञापनों तक पहुंचाया, जहां से वह फिल्मों में खलनायक के किरदार तक पहुंचे. अमरीश पुरी को 1960 के दशक में रंगमंच को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने दुबे और गिरीश कर्नार्ड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं. रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय करियर का पहला बड़ा पुरस्कार था. फिल्मों के ये डायलॉग आज भी जुबान पर चढ़े हुए हैं
फिल्मों में खलनायक के किरदार में अमरीश पुरी को ऐसा पसंद किया गया कि फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ में उनका किरदार ‘मुंगैबो’ उनकी पहचान बन गया. इस फिल्म में ‘मुगैंबो खुश हुआ’ के अलावा ‘तहलका’ में उनके द्वारा बोला गया संवाद ...‘डांग कभी रांग नहीं होता’ भी लोगों की जुबान पर खूब चढ़ा. फिल्म दीवाना का संवाद - ‘ये दौलत भी क्या चीज है, जिसके पास जितनी भी आती है, कम ही लगती है.’ परदेस का - ‘अमरीका में प्यार का मतलब है लेन-देन. लेकिन हिंदुस्तान में प्यार का मतलब है सिर्फ देना, देना, देना.’ इन संवादों में पूरी हिंदुस्तानी संस्कृति निहित है. कई फिल्मों के लिए अमरीश पुरी को मिला सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का खिताब
'प्रेम पुजारी' से फिल्मों की दुनिया में प्रवेश करने वाले अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में ‘निशांत‘, ‘मंथन’, ‘गांधी’, ‘मंडी’, ‘हीरो’, ‘कुली’, ‘मेरी जंग’, ‘नगीना’, ‘लोहा’, ‘गंगा जमुना सरस्वती’, ‘राम लखन’, ‘दाता’, ‘त्रि‍देव’, ‘जादूगर’, ‘घायल’, ‘फूल और कांटे’, ‘विश्वात्मा’, ‘दामिनी‘, ‘करण अर्जुन’, ‘कोयला’ आदि हैं. अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया. उन्होंने अपने पूरे करियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया. उनके जीवन की अंतिम फिल्म ‘किसना’ थी जो 2005 में उनके निधन के कुछ दिन बाद रिलीज हुई.

 

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