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बनारस डायरी: यहां कण-कण में बसता है वो अलमस्त फकीर कबीरा

बनारस डायरी: यहां कण-कण में बसता है वो अलमस्त फकीर कबीरा 
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय...
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
यह संत कबीर की भूमि है. कहते हैं जब उन्हाेंने शरीर त्यागा तो हिंदु मुसलमान आपस में लड़ पड़े थे. हिंदू उनको अपना कहते और अंतिम संस्कार करना चाहते, वहीं मुसलमान इस फकीर को मुस्लिम मानकर दफनाना चाहते थे. लेकिन, जब चादर हटाई गई, वहां कबीर नहीं थे. बस कुछ फूल पड़े थे जिसे उन्होंने आपस में बांट लिया.
पूरी जिंदगी अमन का पैगाम देने वाले, जीवन को रुढि़यों-बंधनों से छुड़ाने वाले उस अलमस्त फकीर के फूल काशी में गमक रहे हैं. कबीरचौरा की जिन गलियों में कभी कबीर खेले, पले-बढ़े, अमन के परवानों के लिए वो किसी इबादतगाह से कम नहीं.
कबीर को जिंदा रखे है ये शानदार कबीर मठ
कबीरचौरा में तकरीबन पांच एकड़ में कबीर का मठ है जहां रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं. खास मौकों पर ये तादाद हजारों में होती है. यहां की इमारत, तराशी गई मूतियों में कबीर आज भी जिंदा है. अपने अलमस्त फकीरी अंदाज के लिए पूरी दुनिया में मशहूर उस कबीर को जानने-समझने यहां रोज सैकड़ों लोग आते हैं.
कबीरपंथ को जानने वालों के लिए यह पाठशाला भी है, मंदिर भी और मस्जिद भी है. जहां धर्म-मजहब की कोई दीवार नहीं. वैसे तो कबीरपंथ पूरे देश दुनिया में फैला है, उसके मानने वाले हर राज्य, शहर में है. यहां आने वालों में सबसे ज्यादा पंजाब, हरियाणा, कश्मीर और गुजरात के अनुयायी हैं. इन राज्यों में करीब 35 फीसदी लोग कबीरपंथी हैं.
कबीर के ताने-बाने पर बढ़ रही काशी की बुनकरी
देश दुनिया में फैला कबीरपंथ एक तरफ और कबीर के ताने-बाने का दर्शन एक तरफ. कबीर कर्म और धर्म दोनों से जुलाहे थे. उनकी नजर में कपड़ा बुनना सबसे बड़ी सभ्यता थी. उनका मानना था कि कपड़ा बुनना दुनिया की सबसे बड़ी सभ्यता है. उस दौर में ही उन्होंने इसकी अहमियत लोगों को समझा दी थी.
कबीर के दौर में कपड़ा बुनने वाले जुलाहे को हीन दृष्टि से देखाता जाता था. उन्होंने उसे दूर करने का काम किया. यही वजह थी कि उनसे जुड़े संत चाहे वो दादू धुनिया रहे हों, गोरा कुम्हार या दरिया नाई, इन संतों ने अपने कर्म के साथ अध्यात्म की राह को रौशन किया. लेकिन, ये विडंबना ही है कि आज जिस कबीर की पूरी दुनिया दीवानी है, काशी के बुनकर उनके दर्शन, उनकी बानी से दूर हैं. काशी के मुस्लिम बुनकर उनसे रिश्ता नहीं गांठ पाए हैं.
काशी में मोक्ष का नहीं रखा मोह
कबीर की इस काशी में भले ही देश दुनिया से लोग मोक्ष प्राप्त करने आते हों लेकिन कबीर को काशी में मोक्ष का मोह नहीं रहा. महंत विवेक दास बताते हैं कि कबीर ने सारी जिंदगी पाखंड, अंधविश्वास का विरोध किया.
‘काशी में मर कर मोक्ष मिलता है’, ये भी कबीर के लिए एक पाखंड ही था. उनका मानना था कि व्यक्ति का मुक्ति उसके कर्म से मिलती है. यही वजह थी कि अंतिम समय में उन्होंने काशी छोड़ दिया और मगहर चले आए. जहां ये माना जाता है कि वहां मृत्यु होने से व्यक्ति गधा बनता है. कबीर ने घर बार छोड़कर जंगल, गुफा, मठ मंदिर जाने का भी विरोध किया. कहां मंदिरों में, गुफाओं में भगवान नहीं मिलते, भगवान तो दिल में बसते हैं.
ब्रिटिश हुकूमत में पड़ गया था ताला
1578 में कबीरचौरा के विशाल प्रांगण में जिस कबीर मठ की नींव रखी गई, आज वो किसी पर्यटन स्थल से कम नहीं. कबीर जहां पले-बढ़े उसकी गलियों को सजाया संवारा जा रहा है. आपको जानकर हैरानी होगी कि ब्रिटिश हुकूमत में तकरीबन दो सौ साल तक यहां ताला लगा रहा. अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर लिया था.
आजादी के उस दौर का ये मठ भी साक्षी था. वारेन हेस्टिंग्स ने जब चेत सिंह किले पर धावा बोला था उस वक्त माधो सिंह के बगीचे में उसे ईंट और पत्थर लेकर लोगों ने दौड़ा लिया था. किसी तरह उसने भागकर अपनी जान बचाई थी लेकिन मठ पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया था. 1781 से लेकर 1950 तक ये मठ अंग्रेजों के ही कब्जे में रहा. उस दौर में तीन संतों ने अपनी जान की बाजी भी लगा दी थी.
कबीर मठ में बनेगी हाईटेक झोपड़ी
कबीर मठ से ही सटे नीरू टीला में कबीर की हाईटेक झोपड़ी बनने जा रही है. कबीरचौरा को हेरिटेज घोषित कर दिया गया है. कबीर की बानी और उनके धर्म अध्यात्म से लोग रूबरू हो सकें, खुद को उनसे जोड़ सकें, इसके लिए पर्यटन के लिहाज से इसे हाईटेक बनाया जा रहा है.
केंद्र सरकार की ओर से यहां हाईटेक झोपड़ी और म्यूजियम बनाने के चार करोड़ 68 लाख के प्रस्ताव की स्वीकृति मिल गई है. बजट भी पास हो गया है. जल्द ही इसका काम शुरू हो जाएगा. म्यूजियम में कबीर से जुड़ी चीजें आम लोगों के लिए रखी जाएंगी. इसके अलावा कबीरचौरा जिसे कि हेरिटेज मोहल्ला घोषित किया गया है, इसे संवारने के लिए दो करोड़ रुपये का बजट जारी किया गया है.
दीवारों पर संत कबीर का जीवन और दोहा
कबीर फक्कड़ी थे. कभी स्कूल नहीं गए लेकिन ज्ञान का अकूत भंडार थे. उन्होंने उस भाषा में दोहे लिखे जो आम लोगों की थी. जिसे हर कोई समझ सके, व्याकरण की बंदिशों से परे. यही वजह थी कि लोगों ने उनकी भाषा को खिचड़ी कहा. कबीर के ताने बाने के दर्शन और उनके दोहे को अब कबीरचौरा की गलियों में देखा जा सकता है. मठ की दर-ओ-दीवार उनके जीवन और दोहे के गूढ़ अर्थों को बता रही हैं. मठ की दीवारों पर म्यूरल आर्ट के जरिये उनके जीवन के प्रमुख हिस्सों और उनके दोहों को उकेरा जा रहा है.
लहरतारा में बनेगा कबीर का स्मारक
कहते हैं, कबीर नीरू और नीमा जुलाहे को लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर रोते हुए मिले थे. रोते हुए इस बालक को वो अपने घर ले आए. अब उसी जगह पर उनका स्मारक बनाने की तैयारी की जा रही है. इसके लिए मठ के महंत विवेक दास ने 18 करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार किया है. इस प्रोजेक्ट के तहत वहां कबीर का स्मारक बनेगा. वहीं शिवपुर में मठ की ओर से अस्पताल भी बनने जा रहा है जो कि विश्वस्तरीय होगा.




About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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