मध्य प्रदेश: नेतृत्व के चक्कर में कांग्रेस का बेड़ागर्क कर रहे पार्टी के तीन बड़े नेता - .

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Wednesday, 19 July 2017

मध्य प्रदेश: नेतृत्व के चक्कर में कांग्रेस का बेड़ागर्क कर रहे पार्टी के तीन बड़े नेता

मध्य प्रदेश: नेतृत्व के चक्कर में कांग्रेस का बेड़ागर्क कर रहे पार्टी के तीन बड़े नेता 

मध्यप्रदेश में पिछले 13 साल से वनवास भोग रहे कांग्रेस के नेता अपने आपसी मतभेद भुलाकर धीरे-धीरे एक मंच पर आ रहे हैं. दशकों से चले आ रहे मतभेदों को कांग्रेस के नेताओं ने सत्ता पाने के लिए लगभग भुला ही दिया है.
युवा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया जहां अपने परंपरागत विरोधियों के बुलावे पर उनके राजनीतिक कार्यक्रमों में जा रहे हैं, वहीं पूर्व केन्द्रीय मंत्री कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ भी अब यह विचार करने लगे हैं कि उन्हें दिल्ली छोड़कर भोपाल की राजनीति करना चाहिए.
सत्ता के लिए है ये मेल-जोल?
लंबे समय बाद यह देखने को मिल रहा है कि कमलनाथ मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के आयोजित किए जाने वाले धरना, प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं. यह पहली बार ही है कि केंद्र और राज्य दोनोंं ही जगहों पर कांग्रेस नीत सरकारें नहीं हैं.
केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली और मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कद्दावर नेता केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने की स्थिति में राज्य की राजनीति में बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं होते थे. यही कारण रहा कि राज्य में कांग्रेस लगातार विधानसभा और लोकसभा के चुनाव पिछले तीन आम चुनाव में हार चुकी है. सिंधिया की मांग नेता प्रोजेक्ट हो, कमलनाथ कहते हैं कि मन तो मुझे बनाना है.
मध्यप्रदेश कांग्रेस की वर्तमान राजनीति में दो चेहरे काफी अहम हैं. ये चेहरे कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के हैं. दोनों ही नेताओं के समर्थक पिछले एक साल से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के समक्ष अपने-अपने नेता के पक्ष में दलीलें पेश कर चुके हैं
पार्टी के अंदर सिंधिया और कमलनाथ में होड़
राज्य के पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा कहते हैं कि कमलनाथ का अकेला चेहरा ऐसा है, जो राज्य के सभी कांग्रेसी नेताओं को साथ लेकर चल सकता है. दूसरी और विधायक रामनिवास रावत कहते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया राज्य के हर वर्ग और समुदाय के लोगों को आकर्षित कर सकते हैं.
उन्होंने आगे जोड़ा- मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे का मुकाबला सिर्फ सिंधिया का चेहरा ही कर सकता है. राहुल गांधी की टीम के सदस्य माने जाने वाले सिंधिया लगातार यह मांग कर रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी को हर राज्य में मुख्यमंत्री के तौर पर किसी चेहरे को प्रोजेक्ट करना चाहिए. जवाब में कमलनाथ कहते हैं कि नेतृत्व को लेकर तो मन मुझे बनाना है. पार्टी के दो दिग्गज नेताओं के बीच नेतृत्व को लेकर चल रही इस रस्साकसी से राज्य की कांग्रेस राजनीति में बड़े परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं.
तीन नेताओं के बीच बंटी है एमपी कांग्रेस
राज्य में लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति तीन बड़े नेताओं के बीच बंटी हुई है. कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह. ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांग्रेस के दिवंगत नेता माधवराव सिंधिया के पुत्र हैं. सिंधिया जब जीवित थे, तब अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया के बीच गुटबाजी थी. दिग्विजय सिंह अर्जुन सिंह गुट का ही हिस्सा थे. कमलनाथ भी अर्जुन सिंह को समर्थन देते रहे. बाद में दिग्विजय सिंह के सारथी बन गए.
माधवराव सिंधिया और अर्जुन सिंह के बीच राजनीति लड़ाई काफी गहरी थी. अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह इन दिनों विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता हैं. अर्जुन सिंह के खास समर्थक माने जाने वाले स्वर्गीय सुभाष यादव के पुत्र, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरूण यादव प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. अरूण यादव को बदले जाने की मांग पिछले एक वर्ष से चल रही है. अजय सिंह छह माह पूर्व ही प्रतिपक्ष के नेता बने हैं. नेता बनने से पूर्व अजय सिंह और अरूण यादव के बीच औपचारिक संवाद के रिश्ते भी नहीं थे.
सिंधिया ने मंदसौर में पुलिस फायरिंग से किसानों की मौत के बाद कांग्रेस के राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव और प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह अब राज्य भर में एक साथ दौरा कर रहे हैं. कई मौकों पर तो दोनों नेता एक साथ एक ही गाड़ी में बैठे दिखाई देते हैं.


सिंधिया भी बदल रहे हैं
बदलाव सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया में भी देखने को मिल रहा है. उन्होंने अपने परंपरागत विरोधियों के यहां आना-जाना और मिलना जुलना शुरू कर दिया है. किसानों की मौत के बाद भोपाल में सिंधिया के सत्याग्रह में उनके विरोधी गुट के नेता भी पूरी तरह सक्रिय रहे. सिंधिया ने भी उदारता दिखाई और अपने कट्टर विरोधी माने जाने वाले भिंड जिले के विधायक डॉ.गोविंद सिंह के लहार में आयोजित किए गए किसान-युवा सम्मेलन में हिस्सेदारी की.
सिंधिया, अर्जुन सिंह के गृहनगर चुरहट भी पहुंच गए. चुरहट में कार्यक्रम का आयोजन प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह ने किया था. सिंधिया ने यहां मंच से स्वर्गीय अर्जुन सिंह के सहयोग का जिक्र किया तो सुनने-देखने वाले हैरान रह गए. सिंधिया यहीं नहीं रूके. उन्होंने रीवा में वयोवृद्ध नेता पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी से भी उनके घर जाकर मुलाकात की.
तिवारी के पुत्र सुंदरलाल तिवारी विधायक हैं. विंध्य की राजनीति में श्रीनिवास तिवारी की पहचान अर्जुन सिंह के विरोधियों में रही है. सिंधिया इस दौर में हर गुट को साधने की कोशिश में लगे हुए हैं. राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी सिंधिया का रास्ता रोकने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा राज परिवार की जमीन को लेकर सिंधिया पर लगातार हमले भी कर रहे हैं. सरकार, कमलनाथ को लेकर ज्यादा परेशान नजर नहीं आती. यही कारण है कि भाजपा के किसी भी नेता ने अब तक कमलनाथ को अपने निशाने पर नहीं लिया है.
दिग्विजय सिंह चाहते हैं किंग मेकर की भूमिका
कमलनाथ लगभग तीन दशक तक मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका निभाते रहे हैं. वर्ष 1980 में उन्होंने पहली बार अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया था. कमलनाथ की भूमिका के कारण ही माधवराव सिंधिया कभी राज्य के मुख्यमंत्री नहीं बन सके. बदली हुई राजनीतिक स्थितियों में दिग्विजय सिंह किंग मेकर की भूमिका निभाने के लिए तैयार नजर आ रहे हैं.
दिग्विजय सिंह दस साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं. वर्ष 2003 में जब भाजपा की सरकार बनी तो दिग्विजय सिंह ने अपने वादे के अनुसार दस साल तक कोई पद नहीं लिया. पिछले तेरह साल में बीजेपी की सरकार ने दिग्विजय सिंह की बंटाधारा की छवि को गहरा कर दिया है. भारतीय जनता पार्टी के नेता यह मानते हैं कि यदि दिग्विजय सिंह राज्य में सक्रिय होते हैं तो चौथी बार कांगे्रस विधानसभा का चुनाव हार जाएगी.
दिग्विजय सिंह की सबसे बड़ी पूंजी उनकी संगठनात्मक क्षमता है. गांव-गांव में उनके समर्थक हैं. वे प्रदेश के स्वीकार्य ठाकुर चेहरा हैं. लहार में डॉ.गोविंद सिंह द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने सिंधिया की और मुखातिब होकर यह टिप्पणी कर सभी को चौंका दिया था कि हम से लड़ना बंद करो, जाकर भाजपा से लड़ो.
दिग्विजय सिंह की टिप्पणी का अर्थ यह निकाला गया कि पार्टी में नेतृत्व का फैसला सिंधिया के कारण ही अटका हुआ है. दिग्विजय सिंह ने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के लिए अपनी अलग रणनीति बनाई है. दिग्विजय सिंह, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नर्मदा यात्रा के जवाब में नर्मदा यात्रा पर निकलने की योजना बना चुके हैं.
उन्होंने तीस सिंतबर को नर्मदा यात्रा पर निकलने का कार्यक्रम बनाया है. छह माह की इस यात्रा के लिए उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से औपचारिक अनुमति मांगी है. 3300 किमी की इस यात्रा में पत्नी अमृता राय उनके साथ होंगीं. उनके यात्रा के मार्ग में 110 विधानसभा क्षेत्र आएंगे. दिग्विजय सिंह ने एलान किया है कि उनका रात्रि पड़ाव पूर्व निर्धारित नहीं होगा. जहां रात्रि होगी, विश्राम वहीं होगा.

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