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मायावती: क्या फूलपुर लोकसभा के उपचुनाव में उतरेंगी बहन जी!

मायावती: क्या फूलपुर लोकसभा के उपचुनाव में उतरेंगी बहन जी! 

मंगलवार को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के मायावती के फैसले से हर कोई हैरान है. सदन में इससे पहले भी कई मौके आए हैं जब मायावती बेहद गुस्सा हुई हैं. लेकिन इससे पहले कभी उन्होंने इस्तीफे की बात नहीं की थी. ऐसे में सवाल है कि क्या मायावती ने यह इस्तीफा गुस्से में आकर दिया है या उसके पीछे कोई बड़ी रणनीति है.
आम सोच यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर पहुंच चुकी मायावती ने अपने परंपरागत दलित वोट को बरकरार रखने के लिए यह स्टंट किया हैं. लेकिन राजनीति के गलियारों में एक सुगबुगाहट और जोर पकड़ रही है. दबी जुबान में बीएसपी के खेमे में चर्चा है कि बहन जी उत्तर प्रदेश की फूलपुर लोकसभा से उप चुनाव में खड़ी हो सकी हैं. वह भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के समर्थन के साथ.
यानी साल 2019 से लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में महागठबंधन का एक प्रयोग फूलपुर लोकसभा के उप चुनाव के वक्त किया जा सकता है. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी इस तरह के गठबंधन पर सकारात्मक बयान दे ही चुके हैं. वहीं मायावती ने भी पिछले दिनों भाजपा को रोकने के लिए किसी के भी साथ हाथ मिलाने का बयान दिया था.
दरअसल उत्तर प्रदेश की फूलपुर लोकसभा सीट से मौजूदा वक्त में भाजपा के केशव प्रसाद मौर्य सांसद हैं. यूपी विधानसभा चुनाव के बाद मौर्य, यूपी सरकार में उप मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लिहाजा उप राष्ट्रपति चुनाव के बाद उनका और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का अपनी गोरखपुर लोकसभा सीट से इस्तीफा देना तय है. जिसके बाद फूलपुर और गोरखपुर में उप चुनाव होंगे.
ऐसे में फूलपुर से मायावती को संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार बना कर मोदी सरकार के खिलाफ उत्तर प्रदेश में बिहार की तर्ज पर महागठबंधन की नींव डाली जा सकती है. साथ ही यूपी की जनता को भी विपक्ष की एकता का सबसे बड़ा संदेश दिया जा सकता है.
बीजेपी के खिलाफ बिहार में महागठबंधन की शुरुआत भी उपचुनाव के साथ ही हुई थी. जब साल 2014 में मोदी लहर के बावजूद लालू-नीतीश के गठबंधन ने बिहार 10 विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में छह सीटों पर जीत हासिल करके सबको चौंका दिया था.
मायावती के लिए आसान नहीं होगी फूलपुर की राह
फूलपुर एक ऐसी सीट है जहां से मायावती के राजनीतिक गुरु और बसपा के संस्थापक कांशीराम भी साल 1996 में हारकर ही लौटे थे. हालांकि साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी कपिल मुनि यह सीट जीत चुके हैं.
लेकिन विपक्ष की एकता के बीच मायावती फूलपुर से चुनाव लड़ने का दांव चलने में हिचकिचा सकती है तो उसकी वजह है साल 2014 का नतीजा. पिछले चुनाव में मोदी लहर के बीच केशव प्रसाद मौर्य ने यहां भारी मतों से जीत दर्ज की थी. मौर्य को मिले वोटों का प्रतिशत समस्त विपक्ष को मिले वोटों के प्रतिशत से अधिक था. पिछले चुनाव में मौर्य को फूलपुर लोकसभा सीट से कुल वैध मतों में से 52.43 फीसदी मत हासिल हुए थे. जबकि दूसरे स्थान पर रहे सपा के प्रत्याशी को 20.33 फीसदी, बसपा के प्रत्याशी को 17.05 फीसदी और कांग्रेस के प्रत्याशी को 6.05 फीसदी वोट हासिल हुए थे. इसके अलावा आम आदमी पार्टी को भी इस सीट से 0.77 फीसदी वोट हासिल हुए थे. यानी भाजपा को इन तमाम विपक्षी पार्टियों को मिले 44.20 फीसदी मतों से 8.23 फीसदी ज्यादा वोट मिले थे. वोटों का यह गणित मायावती के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है.
2014 को बीते हुए तीन साल हो चुके हैं. यूपी से एनडीए के 73 सांसद जीते थे. यूपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बेहद अहम है. स्पष्ट है कि भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में भी इस आंकड़े के करीब पहुंचने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी. ऐसे में इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में महज 19 विधायकों तक सिमट चुकी मायावती को अगर प्रदेश में अपने राजनीतिक रसूख को बचाए रखना है तो खतरा तो उठाना ही होगा.
फूलपुर लोकसभा सीट आजादी के बाद वीआईपी सीट रही है. साल 1952,1957 और 1962 के आम चुनाव में इस सीट से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जीत दर्ज की थी. क्या पता इस बार इस सीट पर होने वाले उपचुनाव से अगले प्रधानमंत्री की किस्मत तय हो जाए.

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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