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कांग्रेस ने भी अंतरात्मा की आवाज सुनकर कई गुल खिलाए हैं

कांग्रेस ने भी अंतरात्मा की आवाज सुनकर कई गुल खिलाए हैं 

भारतीय संविधान की आत्मा किसे कहते हैं? राजनीति शास्त्र के इस सवाल से भला कौन विद्यार्थी नहीं टकराता है! भोंदे से भोंदे विद्यार्थी से भी यह अनिवार्यतः उम्मीद की जाती है कि कम से कम इस सवाल के जवाब में वह भोंदापन नहीं दिखाएगा! सवाल है ही इतना मौलिक और सादा!
जी हां, हमारे संविधान की आत्मा है उसकी 'प्रस्तावना'. तो शह-मात, दुलत्ती, गच्चा और हैरतअंगेज धोबियापाट वाली मौजूदा राजनीति की आत्मा कौन है? कौन है यह 'आत्मा' जो मौजूदा सियासत की प्रस्तावना लिखते हुए कुछ नेताओं के लिए वरदान, पर कांग्रेस के लिए अभिशाप हो गई है.
यह आत्मा है 'अंतरात्मा', जिसकी आवाज की महिमा खूब बुलंद है. ड्रामैटिक और थ्रीलिंग पॉलिटिकल लैंडस्केप पैदा करने वाली 'अंतरात्मा की आवाज की राजनीति' जहां नीतीश ब्रांड सियासत के लिए मुफीद है, वहीं कांग्रेस के लिए ये उलटी पड़ जाती है.
अभी-अभी सुशासन बाबू ने सूक्ष्म आत्मा की पावन आवाज सुनकर पलटी मारी और लगातार चित हो रही कांग्रेस फिर चित हो गई. लालू ही नहीं, राहुल-सोनिया भी चोटिल बदन की मिट्टी झाड़ते रहे गए.
नीतीश की अंतरात्मा की आवाज की राजनीति में सबसे ज्यादा कोई मटियामेट हुआ है तो वह है कांग्रेस, जिसकी बिहार में सीमित जमीन एक पल में छिन गई है. कांग्रेस को यह झटका ऐसे वक्त लगा है, जब वह कद्दावर गुजराती नेता शंकर सिंह बाघेला की अंतरात्मा के डरावने प्रकोप से हुए नुकसान की भरपाई भी नहीं कर पाई है.
प्रदेश में कांग्रेस की बुलंद आवाज रहे बाघेला ने अंतरात्मा के पवित्र इशारे पर पार्टी नेतृत्व को पानी पी-पीकर कोसा और फिर बेदिली से बाय-बाय कर दिया. जो बाघेला राज्य में पार्टी की उम्मीद के सघन साया थे, अचानक से वो पार्टी को संघर्ष की कड़ी धूप में छोड़कर निकल पड़े.
इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव में प्रबल हार के समीकरण को न्यूट्रलाइज करने के लिए कांग्रेस ने अंतरात्मा की आवाज का तुरुप चला, पर वह भी काम नहीं आया. नेताओं की अंतरात्मा अपने-अपने सियासी लाभ के समीकरण में उलझी रही. कोविंद मोदी-अमित-नीतीश की अंतरात्माओं के मिलन का लाभ लेकर प्रणब बाबू के उत्तराधिकारी बन गए. कांग्रेस अंतरात्माओं के बिखराव की राख मलती रह गई.
आखि़र अंतरात्माओं के खेल में कांग्रेस खेत क्यों होती जा रही है? एक वह भी वक्त था जब कांग्रेस ने कतर-ब्योंत की चोटिल राजनीति में अंतरात्मा को खूब भुनाया, पर वही अंतरात्मा अब कांग्रेस का खेल खराब कर रही है.1969 में इसी अंतरात्मा की पावन आवाज ने आंतरिक उठापटक झेल रही इंदिरा को बड़े से बड़े धुरंधरों को पटकनी देकर वीवी गिरि को राष्ट्रपति भेजने में मदद की थी.
विरोधियों की नजर में गूंगी गुड़िया रहीं इंदिरा को अंतरात्मा की आवाज की बुलंदी ने पॉलिटिक्स में वह स्पेस दिया, जिसका वह सपना देखा करती थीं. सिंडिकेट के नेता मुंह ताकते रह गए और गिरि ने संजीव रेड्डी को पटकनी देकर मुगल गार्डन में सैर का पंचवर्षीय ऐतिहासिक सुख हासिल कर लिया.
अंतरात्मा की इसी आवाज को सुनकर सोनिया ने 2004 में पीएम बनने का दुर्लभ मौका छोड़कर अपने पक्ष में देश में दुर्लभ चुनौतीविहीन माहौल पैदा किया था! अंतरात्मा के आदेश पर सहमति का बटन दबाकर उन्होंने अंतर्मुखी मनमोहन सिंह को सत्ता सौंपी और खुद सत्ता का रिमोट अपने पास रखा. अंतरात्मा की आवाज की सियासत ने उनके लिए एक से बढ़कर एक माकूल मौके पैदा किए और वह सियासत में लगभग अजेय हो चली थीं.
आज वही अंतरात्मा कांग्रेस को गच्चा क्यों दे रही है? गांव में एक कहावत है कि जब आप देवता को गलत ग्रह-नक्षत्र में जगाएंगे तो वह भूत बनकर पटकेंगे! क्या यही कांग्रेस के साथ नहीं हो रहा? नीतीश को मौका ताड़ना आता है. वह करियर में कई बार अंतरात्मा की आवाज पर गुलाटी मार चुके हैं, और हर बार माहिर पहलवान बनकर उभरे.
1999 एक रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दिया. सियासी कद को बड़ा करने वाला यह फैसला उनकी अंतरात्मा की आवाज से प्रेरित था. समता पार्टी के गठन से लेकर भाजपा से गठजोड़, तकरार और पुनः गठजोड़ की उनकी माहिर चाल के पीछे अंतरात्मा की आवाज की सियासत छुपी है.
लालू ने राजनीति में अंतरात्मा की बजाए कानूनी बाध्यता को महत्ता दी, इसलिए वह नीतीश नहीं बन पाए. उन्होंने अपने बच्चों को भी ऐसी राजनीति में कच्चा रखा. तेजस्वी पदत्याग कर इस राजनीति का मीठा फल चख सकते थे, पर लालू ने उन्हें सब्र कहां सिखाया है!
नीतीश चैबीसों घंटे अपनी सियासी आत्मा के रेडियो वेब को महसूस करते रहते है. वह आत्मा की आड़ में मन और दिमाग की खूब सुनते हैं. यही कारण है कि वह लालू से मिलते-जुलते रहकर भी 'मन की बात' वाले मोदी के पाले में आसानी से चले गए.
इंदिरा गांधी की कांग्रेस इस राजनीति में माहिर थी, पर सोनिया-राहुल वाली कांग्रेस अंतरात्माओं की सूक्ष्म पैनी चालों को पकड़ नहीं पाती! कांग्रेस नेतृत्व राजनीति की दुरात्माओं को भी चिन्हित करने में नाकामयाब होती जा रही है.
ऐसी राजनीति जिस दिखावटी नैतिक पूंजी की मांग करती है, उसमें भी कांग्रेस वाले कंजूसी करने लगे हैं. उसे इसका भी भान नहीं रहता कि उसकी पार्टी के अंदर या बाहर का कौन नेता कब ऐसी राजनीति का पासा चल देगा और वह मुंह ताकते रह जाएगी. किसकी अंतरात्मा कब दुरात्मा बनकर उसे डस लेगी.
मोदी-केंद्रित राजनीतिक युग में विलुप्तप्राय होते जाने के जोखिम से गुजरती कांग्रेस अब इस कदर नर्वस है कि उसे समझ में नहीं आ रहा कि इक्का का तुरुप कब और किसके साथ मिलकर कैसे चलना चाहिए.




About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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