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कभी बनियान बेच कमाते थे 88 पैसे, आज खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी

कभी बनियान बेच कमाते थे 88 पैसे, आज खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी


कभी बनियान बेच कमाते थे 88 पैसे, आज खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी

कानपुर. कभी 3 हजार रुपए उधार लेकर बनियान बनाने वाले आज 43 करोड़ का बिजनेस करते हैं। कानपुर के रहने वाले बिजनेसमैन बलराम नरूला कहते हैं, मुझे एक दर्जन बनियान बनाने पर 14 आने यानी 88 पैसे मिलते थे। बता दें, 2016 में इनकी कंपनी स्टॉक एक्सचेंज में भी लिस्टेड हो चुकी है। DainikBhaskar.com से बातचीत में बलराम नरूला ने फर्श से अर्श तक के अपने सफर को शेयर किया।
बटवारे के बाद PAK से जान बचाकर पंजाब आए थे माता-पिता

- बलराम कहते हैं, भारत-पाकिस्तान बटवारे के पहले मेरी फैमिली पाक के लाहौर डिस्ट्रिक्ट के कसूर कस्बे में रहती थे। लेकिन बटवारे के बाद मम्मी-पापा और एक बड़े भाई बॉर्डर सीमा खेमकर में आकर रिफ्यूजी कैम्प में रहने लगे। यहां आए-दिन गोलाबारी होती थी, इसलिए फैमिली पंजाब के पट्टी में आकर रहने लगी।
- पट्टी में रिफ्यूजी कैम्प बनाया गया था। कैंप में पिता फकीर चंद को एक कपड़े की दुकान और एक कमरा दिया गया। यहां मेरे साथ 4 भाई और 1 बहन का जन्म हुआ। फैमिली मां पापा को मिलाकर कुल 9 सदस्यों की हो गई।
- बड़े भाई भूषण नरूला साल 1962 में कानपुर में चाचा के पास आ गए थे। चाचा इनर वियर का बिजनेस करते थे। उनका प्रोडेक्ट सम्राट के नाम से मार्केट में बिकता था। भूषण चाचा के बिजनेस में अकाउंट का काम सीखने के साथ मार्केट‍िंग का काम देखते थे।
- उनदिनों चाचा भाई को 120 रुपए महीने सैलिरी देते थे, जिसमें से 90 रुपए वह पिता जी को हर महीने मनी ऑर्डर कर देते थे। इस बीच पिता जी को पंजाब में घर का खर्च चलाने में परेशानी होने लगी, तब उन्होंने पट्टी से कानपुर आने का फैसला किया।
- जुलाई 1967 में मैंने फूफा राम प्रकाश ग्रोवर से कारखाना खरीदने की बात कहकर 700 रुपए उधार मांगे। फूफा जी ने पूरा इस्टीमेट देखने के बाद 3000 रुपए उधार दिए। उन दिनों कानपुर में होजरी का एक पुराना प्लांट करीब 700 रुपए में मिल रहा था, जिसमें सिलाई की मशीने थी।
- मैंने भाई भूषण के साथ मिलकर प्लांट को 700 रुपए में खरीद लिया। कारखाना शुरू करने के बाद मैंने बनियान का गला बनाना सीखा। बाद में मैंने घर से ही जॉब वर्क शुरू कर दिया। 2 कमरे के मकान में एक कमरे में सिलाई मशीन रखा हुआ था और दूसरे कमरे में हम सब भाई-बहन सोते थे।
- 2 साल तक मैंने सूरज देवता के दर्शन नहीं किए। सुबह उठकर फ्रेश होने के बाद मशीन पर बैठ जाता था। चाचा ने शुरुआत में काफी मदद की। उन्होंने 99 फीसदी काम बिजनेस दिलाया। करीब 2 साल तक ये सिलसिला चलता रहा।
चाचा के ब्रांड से 2 पैसे कम में बेचते थे बनियान...

- बलराम कहते हैं, उनदिनो एक दर्जन बनियान के 14 आने (88 पैसा) मिलता था। इसमें बनियान की सिलाई, प्रेस, लेबल लगना और पैकिंग मैटेरियल, एक कारीगर की मजदूरी, गंजी आयरन करने के लिए कच्चा कोयला शामिल था। दिनभर में 100 से 120 दर्जन गंजी तैयार हो जाता था।
- जुलाई 1969 में 2 साल पूरे होने पर सबसे पहले मैंने फूफा जी को 3 हजार रुपए 2 साल के ब्याज के साथ वापस किया। इसके बाद पहली बार मैंने 1969 में 700 रुपए का 100 किलो होजरी का कपड़ा खरीदा और अपना माल बनाना शुरू कर दिया। घर के सभी सदस्य इस काम में जुट गए।
- उधार के रुपए से काम शुरू किया था, इसलिए कभी मन में इसे बंद कर कोई और काम के बारे में सोचा ही नहीं। उन दिनों कानपुर में अलग-अलग दिन अलग-अलग जगहों पर मार्केट लगते थे। हम साइकिल पर माल रखकर मार्केट में जाते और सड़क किनारे फुटपाथ पर दूकान लगा लेते थे।
- चाचा अपनी कंपनी में बने बनियान को 10 रुपए दर्जन बेचते थे, जबकि हमलोगों ने अपने बनियान का दाम रखा 9 रुपए 14 आने दर्जन मतलब 2 आने सस्ता रखा था। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे कारखाने में जो कपड़ा आता था उसे हम लोग खुद साइज के हिसाब से काट लेत थे, जबकि कारीगर कटाई का 2 आने दर्जन लेता था।

ऐसे खड़ी की कंपनी

- 1971 में हमने होजरी बाजार के नाम से फेमस रिजवी रोड पर एक दूकान किराए पर ली, जिसका किराया 70 रुपए था। लेकिन मालिक ने 840 रुपए एडवांस मांगे थे, जिसे हमने 2 बार में दिए। इसके बाद भी हम घूम-घूमकर अपना माल बेचते थे।
- उस समय कोलकाता के काली घाट की बनियान मशहूर थी, जिसकी वजह से हमारा माल ज्यादातर दुकानदार नहीं रखते थे। इसलिए हम कानपुर नगर के अलावा कानपुर देहात और उन्नाव सहित बाहर के क्षेत्रों में अपना माल सप्लाई करने लगे।
- 2 दिन में एक बार भईया या मैं साइकिल से माल सप्लाई करने जाता था। साल 1975 में हमने अपने बनियान का नाम जेट रखा। साल 1978 में पहली बार हमने कानपुर के एक निजी पेपर में अपने प्रोडक्ट का ऐड दिया। इसका ये असर हुआ कि करीब 6 महीने के अंदर हमारा माल बनारस तक जाने लगस। बनियान की डिमांड तेजी से बढ़ने लगी।
- साल 1988 में कानपुर के दर्शनपुरवा में हमने करीब 600 गज का एक प्लॉट लिया, जहां कारखाना बनवाया। उसके बाद साल 1990 में दादा नगर इंडस्ट्रियल एरिया में पांच लाख रुपए में 2500 गज का एक प्लॉट लिया, जहां साल 1992 में एक फैक्ट्री तैयार करवाई और दर्शनपुरवा के कारखाने को दादानगर शिफ्ट कर दिया। 1995 में तमिलनाडु में फैक्ट्री लगाईं।
- अाज इनकी कंपनी बनियान के साथ-साथ इनरवेयर, गोल गले की टीशर्ट और ठंडी के लिए इनर बनाती है।
स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हो चुकी है कंपनी

- इनके मुताबिक, वर्तमान में इनके बिजनेस का सालाना कुल टर्न ओवर 43 करोड़ रुपए का है। साल 2016 में कंपनी जेट निटवियर प्राइवेट लिमिटेड से पब्लिक लिमिटेड हो चुकी है, जिसके बाद कंपनी को स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड करवा दिया गया।
- 40 रुपए के भाव पर इस कम्पनी का आईपीओ मार्केट में आया था, लेकिन आज इसका भाव 80 रुपए चल रहा है।
पिता स्व फ़कीर चंद ने बेटे को दिए थे ये टिप्स
# किसी गरीब आदमी का एक पैसा भी धोखा देकर या उसको दुख देकर नहीं आना चाहिए।
# बिजनेस में अगर किसी के साथ काम बंद करना हो, तो उसको कभी चोट नहीं देना चाहिए, बल्कि वो जो कह रहा है उसी के हिसाब से सबकुछ क्लियर कर काम बंद करना चाहिए। इससे वो कभी भी मार्केट में तुम्हारे खिलाफ कुछ बोल ही नहीं पाएगा।
# इससे चोट खाकर काम बंद किया, फिर जीवन में उसके साथ कभी काम मत करो।

 

About Author saloni

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