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समाजवादी पार्टी में सुलह की कोशिश नाकाम


लखनऊ: समाजवादी पार्टी में सुलह की कोशिश एक बार फिर सफल नहीं हो सकी। मंगलवार को लखनऊ में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच हुई बैठक बेनतीजा रही। इसमें कोई फॉर्मुला नहीं निकल सका। मुलायम और अखिलेश की इस बैठक में चाचा शिवपाल भी मौजूद थे। इस बीच रामगोपाल यादव ने दिल्ली में चुनाव आयोग के साथ बैठक के बाद कहा कि कोई समझौता होने नहीं जा रहा। हम अखिलेश यादव की अध्यक्षता में चुनाव लड़ने जा रहे हैं।
मुलाकात के दौरान अखिलेश पक्ष की पेशकश मुलायम सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष रहें, अमर सिंह पार्टी के बाहर रहें, शिवपाल को केंद्र की राजनीति में भेजा जाए, शिवपाल यूपी की सियासत में दखल ना दें, अखिलेश पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनें, रामगोपाल यादव को टिकट बांटने का अधिकार मिले। इधर, आजम खान पिता-पुत्र के बीच सुलह कराने की कोशिशों में लगातार जुटे हुए हैं। आज़म ने कहा कि कोई नहीं चाहता कि समाजवादी सरकार जाए। अल्पसंख्यक समुदाय में इसे लेकर मायूसी है, लेकिन अभी सारे दरवाजे बंद नहीं हुए हैं। वह सपा को एकजुट करने की कोशिशें जारी रखेंगे।चुनाव आयोग से मुलाकात के बाद आज रामगोपाल यादव ने कहा है कि 90 फीसदी विधायक अखिलेश यादव का समर्थन कर रहे हैं इसलिए उनके गुट को ही समाजवादी पार्टी माना जाना चाहिए। रामगोपाल ने यह भी कहा कि पार्टी का चुनाव चिह्न भी उनके गुट को ही मिलना चाहिए। इससे पहले सोमवार को मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, अमर सिंह और जया प्रदा चुनाव आयोग पहुंचे थे और अपना पक्ष रखा था। साइकिल का हैंडल कौन थामेगा अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है हालांकि यह भी सही है कि इस तरह के मामलों में फैसले के लिए कई महीनों का वक्त चाहिए।ऐसे में साइकिल जब्त हो सकती है. इसका अहसास दोनों खेमों को है, लेकिन हथियार डालने को कोई तैयार नहीं। चुनाव आयोग के मुताबिक वह दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद ही फैसला करेगा, जिसकी सुनवाई कोई सदस्य नहीं बल्कि पूरा कमीशन करेगा, लेकिन इसमें कुछ महीनों का वक्त लग सकता है। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक, इस तरह के मामलों में फैसला सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक दिए जाते हैं। देखा जाएगा कि बहुमत किसके साथ है। फैसला नहीं होने पर चुनाव चिन्ह फ्रीज हो जाएगा। दोनों पक्षों को अस्थायी चुनाव चिह्न मिलेग। दोनों पार्टियां भी अस्थायी चिह्न चुन सकती हैं।

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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