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ओ पनीरसेल्वम जयललिता के उत्तराधिकारी

paneerselvam
नई दिल्ली: ओ पनीरसेल्वम जे जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु के 19 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। जयललिता के बीमार होने के बाद पिछले ढाई महीनों से वह प्रदेश के कार्यवाहक मुख्यमंत्री की भूमिका में थे। उन्हें जयललिता का सबसे करीबी और विश्वासपात्र माना जाता था।
जयललिता को भ्रष्टाचार के मामले में जब सुप्रीम कोर्ट ने साल 2001 में सजा सुनाई। उसके बाद 21 सितंबर 2001 को वो पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। 1 मार्च 2002 तक वह तमिलनाडु के 13वें मुख्यमंत्री रहे। पनीरसेल्वम या ओपीएस दक्षिण की थेवर जाति के हैं। अपनी जाति से वह पहले ऐसे शख्स हैं, जिसका इतना ऊंचा राजनीतिक करियर है। 1970 के दशक में उन्होंने ठेणी में पीवी कैंटीन नाम से चाय की दुकान खोली थी, जिसे 80 के दशक में उन्होंने अपने भाई को सौंप दिया। बाद में इसका नाम रोजी कैंटीन कर दिया गया। इसके बाद साल साल 2014 में कर्नाटक हाइकोर्ट ने जब जयललिता को सजा सुनाई तब जयललिता ने एक बार फिर पनीरसेल्वम पर विश्वास जताया। इस तरह वह दूसरी बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। 2014 में उन्होंने तमिलनाडु के 17वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।वह 11 मई 2015 तक मुख्यमंत्री के पद पर रहे जब कनार्टक हाईकोर्ट ने आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में उन्हें बरी नहीं कर दिया। इसके बाद जयललिता 6वीं बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। जयललिता के मंत्रिमंडल के वह सबसे कद्दावर मंत्री थे। उनके पास वित्त, योजना, संसदीय कार्य, चुनाव, पासपोर्ट और प्रशासनिक सुधार जैसे मंत्रालय थे। साल 2006 में विधानसभा में हारने के बाद तमिलनाडु विधानसभा में दो सप्ताह तक प्रतिपक्ष के नेता रहे थे। वह पेरियाकुलम से विधायक निर्वाचित हुए थे। इसके बाद जयललिता तब विपक्ष की नेता बनी जब विधानसभा अध्यक्ष ने एआईएडीएमके के सभी विधायकों को सदन से निष्काषित कर दिया था। तब जयललिता ने सदन नहीं जाने का निर्णय किया था जिसे बाद में उन्होंने बदल दिया। 14 जनवरी 1951 को जन्मे ओ पनीरसेल्वम एक चाय की दुकान चलाते थे। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि ओपीए का सिर्फ एक ही सपना था। वह सिर्फ पेरियाकुलम नगरपालिका का चेयरमैन बनना चाहते थे। 1996 में उनका यह सपना पूरा हो गया। इसके बाद उन्हें कई मंत्री पद मिले और ईश्वर के आशीर्वाद से उन्हें मुख्यमंत्री बनना भी नसीब हुआ। 1996 में वह नगर पालिका अध्यक्ष चुने गए थे। इस बार वह थेनी जिले की बोडनियाकन्नूर सीट से विधायक चुने गए हैं। पनीरसेल्वम जयललिता के प्रति वफादारी दिखाते रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद जयललिता को दंडवत प्रणाम करने की तस्वीरें सुर्खियां बटोरती रही हैं। वह जयललिता की तस्वीर को सामने रखकर कैबिनेट मीटिंग की अध्यक्षता करते रहे थे। कई बार सार्वजनिक रूप से जयललिता के लिए रोते हुए देखा गया।1987 में जब सेलवम के प्रिय नेता एमजी रामचंद्रन नहीं रहे और अन्नाद्रमुक का विभाजन हो गया तो वह जानकी रामचंद्रन के साथ हो गए। लेकिन जब उन्होंने देखा कि जयललिता मजबूत होकर उभर रही हैं तो वह उनके साथ हो गए। इसके बाद वह पूरी तरह जयललिता के प्रति समर्पित हो गए। इसी का उन्हें पुरस्कार मिला और वह मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे।

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