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राष्ट्रीयता और उदारीकरण एक दूसरे के विरोधी नहीं:सीएम

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भोपाल: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि भारत की माटी और संस्कृति में उदारीकरण और भूमंडलीकरण है। राष्ट्रीयता और उदारीकरण एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक ही है। मुख्यमंत्री लोक-मंथन के दूसरे दिन नव-उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता विषय पर आयोजित सामूहिक सत्र को संबोधित कर रहे थे।
चौहान ने कहा कि भारत में हजारों वर्ष पहले वसुधैव कुटुम्बकम् की बात कही गयी है। यह उदारीकरण ही है। भारत में हमेशा विचारों की स्वतंत्रता रही है। पश्चिम में राजतंत्र के बाद स्वतंत्रता और समानता के उद्देश्य को लेकर प्रजातंत्र का जन्म हुआ। औद्योगिक क्रांति के बाद शोषण के विरूद्ध सर्वहारा के लिये साम्यवाद का जन्म हुआ। साम्यवाद और इसके बाद पूँजीवाद में भी मनुष्य का सुख संभव नहीं हो पाया। मनुष्य के लिये शरीर के साथ मन, बुद्धि और आत्मा का सुख भी जरूरी है। भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ,काम, मोक्ष और पुरूषार्थ के माध्यम से जीवन संचालन की व्यवस्था की गयी है। मनुष्य केवल व्यक्ति नहीं समाज भी है इसलिये समाज के सुख पर भी विचार करना होगा। भारतीय दर्शन का मूल है कि एक ही चेतना सर्वव्याप्त है। प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि दोहन करना चाहिये। विश्व को यही सनातन विचार राह दिखा सकता है। चौहान ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानव-दर्शन का विचार दिया, जो भारतीय परंपरा पर आधारित है। उन्होंने कहा कि जीवन में अर्थ का अभाव नहीं होना चाहिए और अर्थ का प्रभाव भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने केन्द्र सरकार के निर्णय का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करके अर्थ का प्रभाव समाप्त कर दिया है। इस निर्णय से काला धन, फर्जी मुद्रा और आतंकवाद की फंडिंग समाप्त हो जाएगी। पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं भारतीयता के विचारक डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि भारत की राष्ट्रीयता वसुधैव कुटुम्बकम् की पोषक है जबकि वैश्वीकरण केवल आर्थिक चिंतन है। दोनों में भेद तो है किन्तु समन्वय की जरूरत भी है। पश्चिमी चिंतन में संसार को निर्मित करने वाला संसार के बाहर रहता है, बनाता भी है और सजा भी देता है। मनुष्य को पृथ्वी के उपभोग के लिए भेजता है। पश्चिमी चिंतन में यह माना जाता है कि प्रकृति जड़ है और विचार नहीं कर सकती इसलिए उसका उपभोग करने की स्वतंत्रता है। डॉ. जोशी ने कहा कि कहा जा रहा है कि ग्लोबलाईजेशन गरीब और गरीब देशों के लिए नहीं है। इसके मूल में भी पश्चिमी चिंतन है कि चेतन अचेतन का शोषण कर सकता है। भारतीय संस्कृति में अर्थ चिंतन का आधार अर्थायाम है अर्थात संतुलन। जरूरत से ज्यादा भी नहीं और आवश्यकता से कम भी नहीं। पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव हम पर भी हो रहा है। परिवार हमारी मूल संस्था है इसका टूटना विश्व का टूटना है। आज का ग्लोबलाईजेशन व्यष्टि, समष्टि और परमेष्टि में बाधा डालता है। समृद्धि से शांति नहीं मिलती इसका संतुलन भारत से समझना होगा। पश्चिम को केवल बाजार चाहिए। हमें परिवार भी चाहिए बाजार भी चाहिए। नीति आयोग के सदस्य डॉ. विवेक देबोराय ने राष्ट्रीयता के परिपेक्ष्य में स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की जनता मोक्ष पर विश्वास करती है। सत् चित् आनंद में विश्वास करती है। यदि मुझे भारत पर गर्व नहीं है तो इसका अर्थ है कि मुझे स्वयं पर भी गर्व नहीं है। ग्लोबलाईजेशन के नाम पर हमारी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। हम अपनी संस्कृति और परंपरा को भी नहीं जानते। हमारे पैंतीस हजार शास्त्रों में से उन्नीस हजार का अनुवाद भी नहीं हुआ है।

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